6 अक्टूबर बेनीपट्टी बंद... याद शायद होगा ही. नहीं तो पोस्ट में दिया हुआ वीडियो देखिये ठीक एक साल पहले 6 अक्टूबर 2018 के सुबह 8 बजे की वीडियो है.
दरअसल एक पुरानी मांग थी बेनीपट्टी मुख्यालय में सार्वजनिक शौचालय निर्माण की. बेनीपट्टी विधानसभा भी है, अनुमंडल भी है. शिक्षा का हब है हज़ारों छात्र पढ़ने आते हैं. ऐसे में मुख्य बाजार में जीर्णशीर्ण पड़े सार्वजनिक शौचालय के जीर्णोद्धार को लेकर आंदोलन हुआ था. कई दफे सड़क जाम, वार्ता हुआ था. काम कच्छप गति में बढ़ रहा था साल बीत गए आश्वासन के यह मंजूर नहीं था. इतंज़ार करते-करते अचानक आक्रोश बढ़ा और कुछ साथियों के साथ बेनीपट्टी प्रखंड कार्यालय पर धावा बोल दिए. काम काज सब ठप करवा दिया गया. एक-एक कर्मी को कार्यालय से बाहर निकाल दिया गया. बीडीओ मनोज कुमार जो अभी भी हैं ही उनको खूब गलियाया गया. चुनाव को लेकर एक बैठक चल रही थी, बीडीओ साहब हौले में ले रहे थे, मिलने आ नहीं रहे थे तो सभी घुस गए अंदर मीटिंग हॉल में और जमकर कीर्तन हुआ. ऐसा आरोप हमलोगों पर लगा था.
बीडीओ साहब हम लोगों के आक्रोशित व्यवहार को देखकर ब्लॉक को छोड़ चलते बनें. हमलोग धरने पर बैठ गए इस बात को लेकर कि बीडीओ मनोज कुमार ने बात करने की पहल क्यों नही की. धरना स्थल पर करीब 30-40 साथी रहे होंगे रात हुई, सुबह आई. इस दौरान भाषणों में बेनीपट्टी प्रशासन, विधायक, सांसद, बेनीपट्टी प्रखंड प्रमुख सोनी देवी और उनके पति का नाम बार-बार आ रहा था. क्योंकि पंचम वित्त आयोग के तहत बनने वाले सार्वजनिक शौचालय का शिलान्यास विधायक भावना झा के हाथों प्रमुख सोनी देवी और प्रमुख पति ने ही करवाया था.
अब तक प्रमुख पति ने बेनीपट्टी इलाके में खुद का नाम लेकर जिंदाबाद करने वाले बहुत पाले थे लेकिन सिर्फ जिंदाबाद ही नहीं बल्कि जनता से धोखा करने पर मुर्दाबाद करने वाले कुछ जिंदा लोग भी बेनीपट्टी में पैदा लिए हुए हैं यह उस दिन प्रमुख और उसके पति को पता चला.
धरने से प्रशासन पर बढ़ते दवाब को देखते हुए पहले तो प्रमुख पति ने सब कुछ सही करने की कोशिश कि क्योंकि शौचालय निर्माण कार्य में शिथिलता के जिम्मेदार कहीं ना कहीं प्रमुख ही थी. जिसको लेकर प्रमुख पति ने ब्लॉक में तालाबंदी और धरने की सुबह शौचालय निर्माण का कार्य शुरू करवाना चाहा भी. लेकिन चंद घंटों में बहुत कुछ मुनासिब नहीं था, ठेकेदार हमलोगों से लगातार बात कर रहे थे लेकिन धरने पर बैठे कोई भी व्यक्ति मानने के लिए तैयार नहीं थे. इधर हम लोगों का धरना और उधर प्रशासन का दवाब. प्रखंड कार्यालय का एक भी कमरा अगले सुबह नहीं खुला. सभी कर्मी सड़क पर घूम रहे थे. क्योंकि कार्यालय के बाहर हमलोग बैठे थे. ऐसे में प्रमुख पर प्रशासन का दवाब बन रहा था. क्योंकि आश्वासन और काम तो उसे ही करवाना था. लाचारगी में बेचारे अपनी फजीहत को देख कुछ जिंदाबादी जिनको रोजगार मुहैया करवाकर खुद के लिए लाठी उठवाने वाले लोगों के साथ प्रमुख पति ब्लॉक कार्यालय पर पंहुचकर पहले तो हमलोगों से बात की. फिर वार्ता में असफल हुए तो सनक ऐसी चढ़ी कि हम लोगों पर धरना स्थल से हटाने के लिए जानलेवा हमला कर दिया. कितनों का मोबाइल लूटा, पैसे छीने, चप्पल चुराए.
धरने पर 20-25 साल के लड़के थे, सभी अपनी जान बचाकर निकले वहां से. प्रमुख पति जो दर्जनों जिंदाबादी लठैतों को लेकर आये थे उन लोगों ने जमकर लाठियां हथियार भांजी. सारी घटना सीसीटीवी में कैद हुई.
बता दें कि यह बदला इसलिए भी था क्योंकि इन लठैतों के रहते हुए एक दिन पहले हमलोग प्रमुख सोनी देवी का साड़ी फाड़ दिए थे. थाने में ऐसा आवेदन गया था प्रमुख पति के तरफ से कि हुजूर माय बाप ऐसा-ऐसा हुआ है. यानी प्रमुख पति अपनी पत्नी का रक्षा नही कर सके थे एक दिन पहले. जिसके खींझ में प्रमुख पति ने घातक कदम उठाया. हमलोगों पर हमला कर दिया. हमलोग ब्लॉक परिसर से हटकर बगल के महिला कॉलेज पंहुचे. माहौल गर्म हुआ तो प्रशासन के अधिकारी भी पहुंचे. जोर-आजमाइश बहस हुई आवेदन लिखी गई और प्रमुख पति और अन्य कुछ लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर हमलोगों ने कर दी. एफआईआर में एक फोर व्हलीर स्कार्पियो गाड़ी का भी हमलोगों ने जिक्र किया कि इस नम्बर की गाड़ी से यह लोग आए थे हमलोगों पर हमला करने. साथ ही एफआईआर में इस बात का जिक्र प्रमुखता से किया गया था कि ब्लॉक परिसर में हुई घटनाक्रम का सीसीटीवी में कैद है.
प्रमुख पति के खिलाफ सभी के मन में आक्रोश था जो कम होने का नाम नहीं ले रहा था. तत्काल जितने भी लोग जुटे सभी फिर थाने पंहुच गये और प्रमुख पति की गिरफ्तारी की मांग करने लगे. प्रशासन लाचार थी प्रशासन से ऐसा करना संभव नहीं था. जिस गाड़ी से प्रमुख पति के पलित पोषित लोग प्रखंड कार्यालय पर हमलोगों से मारपीट करने आये थे, वह गाड़ी शान के साथ उसी समय थाने में घुसी जिसे बांकी साथियों ने पहचान लिया और कड़ा विरोध दर्ज करवाकर गाड़ी को थाने में लगवाया. बेनीपट्टी थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष हरेराम साह गाड़ी क थाने में लगवाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे जबकि एफआईआर में हमलोगों ने उस गाड़ी का नम्बर भी दिया था. और जब थाने में वह गाड़ी आई थी तो गाड़ी में लाठी-डंडे असलहे रखे हुए थे. थानाध्यक्ष को हमलोगों ने दिखाया भी... उलटे थानाध्यक्ष हमलोगों का वीडियो बनाने लगे इस ध्येय से कि हमलोग डर जाएं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
दवाब बढ़ता देख थानाध्यक्ष को गाड़ी को जब्त करना पड़ा. अगले दिन अखबार में भी छपी की गाड़ी को जब्त कर लिया गया था. लेकिन उसी दिन ना जाने क्या खेल हुआ प्रशसान ने चोरी छिपे गाड़ी को छोड़ दिया. जबकि हमलोगों के तरफ से दिए गये आवेदन में उक्त गाड़ी का भी जिक्र किया गया था कि इसी गाड़ी से लाठी डंडे और असलहे लेकर वो लोग आये थे. जो कि गाड़ी को जब्त करने वक्त हमलोगों ने थानाध्यक्ष को दिखाया भी था और इसका वीडियो भी बनाया था. बाद में जब हमलोगों ने गाड़ी छोड़ने को लेकर थानाध्यक्ष से सवाल किया तो तरह-तरह के कानूनी ज्ञान पढ़ा दिया गया. सीसीटीवी की जब हमलोगों ने मांग की तो टेक्निकल ज्ञान पढ़ा दिया गया. यहां तक कि हमलोगों ने यह भी कहा कि सोनी देवी की साड़ी फाड़ने की घटना भी हुई होगी तो वह सीसीटीवी में होगी इसीलिए सच्चाई सामने लाइये जनता के. लेकिन प्रशासन ने ऐसा कुछ नही किया. इस बहुत सारे लोगों का कॉल रिकॉर्ड भी किये जो सीसीटीवी के खेल बेल में संलिप्त थे.
यहां से थोड़ी-थोड़ी समझ आने लगी थी कि भैया राजनीति इतनी आसान नहीं है. सब कुछ प्रत्यक्ष है और कुछ भी अपने पक्ष में नही जा रहा हैं.
खैर बाज़ार में यह चर्चा का विषय था. हमले से सभी के मन में भय हो गया आप 30-40 लड़के थे धरना पर तो प्रमुख पति के 50-60 जिंदाबाद लठैत आये और आप लोगों के साथ मारपीट किया. कल आप 50-60 रहेंगे वह 100-110 की संख्या में आएगा. क्योंकि अब तक हम लोगों को यह अनुभव हो चुका था कि जब प्रशासन का सीसीटीवी नोटों के आगे अंधा हो सकता है तो ऐसे में कुछ भी हो सकता है.
सारी घटनाक्रम पर नजर बनाए यूनियन का ऊपर से आदेश आया... बेनीपट्टी बंद.
एक बार यह सुनकर हमलोग आवाक रह गए. बेनीपट्टी बंद ? यह कैसे सम्भव होगा. जिस मुद्दे के लिए हमलोग लड़ रहे थे उस मुद्दे पर जब हमलोग धरना प्रदर्शन, सड़क जाम करते हैं तो उसमें 50-100 लोग रहते हैं ऐसे में बेनीपट्टी बंद... क्या लोग समर्थन देंगे ? यह सवाल दिमाग में बार-बार आ रहा था.
1 अक्टूबर को यूनियन के तरफ से पूर्व में विभिन्न मुद्दों पर मिथिला बंद का आह्वान किया जा चुका था. जिसको सफल बनाने में सभी लगे हुए थे. यह सफल हुआ फिर सभी 6 अक्टूबर की तैयारी में सभी जुट गये.
2 अक्टूबर को सागर और प्रिय रंजन बेनीपट्टी पहुंचे. ऑन पेपर प्लान तैयार हुआ. बेनीपट्टी प्रशासन को 6 अक्टूबर की बंदी का ज्ञापन नहीं देकर डीएम मधुबनी को सौंपा गया. 3 अक्टूबर को ऑटो पर माइक सेट कर अड़ेर से बेनीपट्टी के संसारी पोखर होते हुए अंबेडकर चौक यानी बेनीपट्टी के शुरुआती छोड़ से अंतिम छोड़ तक यह ऐलान हुआ 6 अक्टूबर को बेनीपट्टी बंद रहेगा. 3 अक्टूबर बेनीपट्टी बेहटा बाज़ार का दिन था. लोग बाज़ार में चींटी की तरह भरे हुए थे. ऐसी भीड़ के बीच से ऑटो और उसके पीछे दर्जन भर युवा बंद का आक्रोशपूर्ण घोषणा कर रहे थे. घोषणा में जिस तरह से शब्द का का इस्तेमाल किया जा रहा था वह बेनीपट्टी को समझने-जानने वाले लोगों को अपेक्षित नही था. सब कुछ नया था.
तल्ख लहजे में जोरदार ऐलान हुआ. 3 दिन बाद यानी 6 अक्टूबर को बंद का ऐलान था. बाज़ार में गहमागहमी माइक पर जिस तरह से एनाउंस हो रहा था उसी से शुरू हो गई. माहौल टाइट हो रहा था. खबर डीएसपी साहब को लगी. डीएसपी साहब बेनिपट्टी से बाहर थे. उन्होंने मेरे नम्बर पर कॉल करके कहा - क्या करवा रहे हो बिकास ? यह सही नही है. मैं सारी बातों को जानते हुए भी बाज़ार में हो रहे एनाउंस को लेकर उनके सामने फोन पर अनभिज्ञता जाहिर की. मैनें कहा - सर हम तो घर पर सोये हुए हैं. हालांकि अगर ऐसे एनाउंस हो रहा है तो यह गलत है, जो साथी ऐसा कर रहे हैं मैं समझाने का प्रयास करता हुं. वैसे सुने हैं कि डीएम साहब को ज्ञापन दी जा चुकी है. इतना बस बात हुआ डीएसपी साहब से. लेकिन मैनें किसी भी साथी को इस बात की जानकारी नही दी कि डीएसपी साहब का कॉल आया था और उन्होंने घोर आपत्ति की है.
कुछ घन्टों बाद सभी साथ एनाउंसमेंट के बाद चयनित जगह पर पहुंचे जहां सबको रात को इकट्ठा होना रहता था. जहां मैनें डीएसपी साहब के आये हुए कॉल के बारे में जिक्र किया.
बाज़ार में हुए एनाउंस ने नए चर्चे को जन्म दे दिया था. सभी के जुबान पर यही मामला था. चारों तरफ माहौल टाइट था. ब्लॉक पर हुई घटना के बारे में बाज़ार में लोग लगातार चर्चा कर ही रहे थे, अब आशंका में थे 6 अक्टूबर को क्या होगा ? कितने लोग आएंगे बाहर से ? क्या लोग समर्थन देंगे बंदी को ? क्या लोग दुकानें बंद रखेंगे ?
इस बीच 3 अक्टूबर को बाज़ार में हुए एनाउंस के बाद प्रशासन पूरी तरह दवाब में आ गई. 3 अक्टूबर की रात से मेरे घर पुलिस के अधिकारियों का आना जाना तेज हुआ. पुलिसकर्मी या कोई इंसान बुरा नही होता उसका वक्त और हालात बुरा होता है. कुछ ऐसा ही प्रतीत हुआ जब कुछ पुलिसकर्मी अकेले घर पर आते थे और ऑफिसियली अपनी ड्यूटी के कामों के अलावे अनऑफिसियली हो रहे घटनाक्रम को लेकर सारी बातों को साझा करते थे. हम बार-बार दोहराते गिरफ्तारी क्यों नही हो रही है ? जो जवाब मिला वह बड़ी सीख दे गया. उसका जिक्र यहां नहीं किया जा सकता है.
खैर हमनें उसी रात से घर पर सोना छोड़ दिया और बांकी साथियों के साथ अज्ञात ठिकाने पर रहने लगा. 3 अक्टूबर को एनाउंसमेंट के बाद खबर यह भी मिली की प्रशासन इस स्थिति से निपटने के लिए यूनियन के अग्रणी साथी जो इसमें लीड कर रहे थे उनको 6 अक्टूबर तक के लिए गिरफ्तार भी कर सकती है शांति व्यवस्था भंग करने की साजिश रचने के आरोप में. ऐसे में हमलोगों ने ठिकाना बदल लिया. योजना पर काम चल रहा था. एनाउंसमेंट से हुए माहौल टाइट की खबर प्रमुख पति और उनके लोगों तक पंहुची, खलबली बढ़ी.
3 तारीख को हुए एनाउंसमेंट के बाद प्रशासन के निशाने पर हमलोग थे. इस स्थिति से निपटने के लिए बखूबी प्रशासन अपना काम कर रही थी. ऐसे में 3 तारीख के बाद हमलोगों ने बेनीपट्टी बाज़ार में विजिबलिटी कम कर दी.
इस सबके बीच 4 तारीख बीत गया और इस बीच में मेरे और मेरे बांकी साथियों के घर पुलिसकर्मियों का आना जाना जारी रहा. पुलिसकर्मियों का घर पर पहुंचने का ध्येय कुछ गलत नही था. बस वह बार-बार मां-पापा को यह समझा रहे थे कि इससे क्या होगा ? भविष्य खराब हो जाएगा सब लड़का का... जरा सबको समझाइए-बुझाइए आदि इत्यादि.
बेनीपट्टी में पारंपरिक बंदी जो कि राजनीतिक दलों द्वारा या आरक्षण जैसे विषयों पर अब तक हुआ था जिसमें कई में मैं खुद भी प्रत्यक्ष गवाह रहा था. कुछ वैसा ही बंदी का अनुमान व्यक्तिगत तौर पर हम 6 अक्टूबर को लेकर भी कर रहे थे. यानी आपका भीड़ देखकर दुकानदार शटर तो गिराएंगे, लेकिन भीड़ आगे बढ़ती ही पीछे से दुकान की शटर उठ जाएंगी. मतलब आपके दवाब से दुकानें बंद तो होगी लेकिन दुकानदार व्यवसायी नैतिक समर्थन नहीं करेंगे.
बता दें कि प्रमुख पति का राजनीतिक कैरियर करीब एक दशक से अधिक का था. फिलहाल वह मेन स्ट्रीम राजनीति में खुद का भविष्य तलाश रहे हैं. ऐसे में अपनी राजनीतिक धौस को जिंदा रखने के लिए वह सभी प्रयास कर रहे थे. बेनीपट्टी एक विधानसभा है और बेनीपट्टी मुख्यालय के तमाम दुकानदारों से 5 अक्टूबर की रात प्रमुख पति ने अपने जिंदाबादी लोगों के साथ घूमकर एक-एक दुकान जाकर यह ऐलान किया कि आप लोग मेरे रहते चिंता न करें कल बेनीपट्टी बंद में अपनी दुकान बंद ना करें, हम है आपके साथ. हम देंगे आपको सुरक्षा. यहां तक कि बेनीपट्टी पोस्ट ऑफिस के पास एक मुस्लिम चाचा हैं उनको पैसा तक ऑफर किया कि खुद की दुकान खुली रखना और दूसरों को भी बोलना खोलने. लेकिन उनका जवाब था - तुम हमारे मालिक नहीं हो. ऐसा सुनने में आया.
लेकिन आज भी इन सब बातों को लिखते हुए मन में फिर से वही सवाल आता है... जो व्यक्ति सैकड़ों को रोजगार दे रहा है.. जिसके पास नामी-बेनामी संपत्ति की कमी नहीं है.. जो अपनी पत्नी को प्रमुख बनाने के लिए बेनीपट्टी प्रखंड के सभी 46 पंचायत समितियों को एक साथ मैनेज कर सकता है, पत्नी को निर्विरोध प्रमुख निर्वाचित करवा सकता है. उस आदमी कि ऐसी भी हालत हो सकती है कि 20-25 साल के कुछ युवाओं के सामने वह खुद को इतना असुरक्षित महसूस करने लगा कि उसको भाड़े पर गुंडे बुलवाने पड़े ? ऐसी हैसियत कि दुकानदारों को दुकान खोलने के लिए बोले तो वह बंद कर लें ? वह अपनी लड़ाई 20-25 साल के कुछ युवाओं से ठानें ? वह इतना बेबस हो जाए कि अपनी पत्नी कि साड़ी फाड़ने का झूठा आरोप लगाए ? फिर किस बात के दबंग... फिर किस बात कि मर्दानगी ? किस काम की संपत्ति ?
खैर... अब प्रशासन के लिए यह चुनौती बन चुका था. क्योंकि प्रमुख पति अपनी राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए हर यत्न प्रयत्न कर रहा था. पहले तो रात में दुकानदारों से मिलकर 6 अक्टूबर को दुकान खोलने की आग्रह की. यह सफल होता हुआ नहीं देख पैसे के बल पर बनाये गये सैकड़ों जिन्दाबादी लठैतों को बेनीपट्टी बुलाया गया जो प्रमुख पति के दिए हुए रोजगार से अपना परिवार चलाते हैं. यह खबर प्रशासन को लगी, इसके बाद प्रशासन की दर्जनों गाड़ियां रात के 11 बजे से 2 बजे के बीच बेनीपट्टी की सड़क पर सायं-सायं सायरन बजाते हुए मार्च करने लगी. हमलोग रात में एक मंदिर पर रुके थे. प्रशासन की गाड़ियों का काफिला जिस तरह से बेनीपट्टी में रात में दौड़ रहा था उसको देखते हुए हमलोगों ने यह सोचकर फिर से ठिकाना बदल लिया कि क्या पता प्रशासन किसी अनहोनी के आशंका से स्थिति को निपटने के लिए हमलोगों को रात में ही गिरफ्तार ना कर लें.
खैर सुबह हुई... जबरदस्त हुई. वह सुबह 6 अक्टूबर 2018 की थी. जब सूरज की किरणों की पौ फट रही थी उससे पहले बेनीपट्टी के एक-एक चौराहे पर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई. कदम दर कदम पुलिस की कई टुकड़ियां बेनीपट्टी में मार्च करने लगी. 7 बजे तक इक्का दुक्का चाय की दुकानें भी जो खुली थी वह भी बंद हो गई. क्योंकि सड़क पर लोग थे ही नहीं. ऐसा बेनीपट्टी के इतिहास में पहली बार हुआ था. बेनीपट्टी में हुए कई बंदी का हिस्सा में खुद भी रहा हूं लेकिन जो दृश्य बेनीपट्टी में 6 अक्टूबर 2018 को था वह अविश्वसनीय था सड़कें पूरी तरह सुनसान थी. सड़कों पर सिर्फ पुलिस की गाड़ियां थी, सैकड़ों पुलिस वाले थे. यही सुनसान सड़कें बंद दुकानें हमारी सबसे बड़ी जीत थी.
समय बढ़ता गया करीब 9 बजे तक संसारी पोखरा के पास 20-25 सेनानी जुटे थे. बाज़ार में सन्नाटा था. लोग-एक दूसरे से पूछ रहे थे कहां है एमएसयू वाले ? कब आएगा मार्केट तरफ ?
देर हो रही थी लोग आशंकाओं से घिर रहे थे. क्योंकि देर काफी हो गई थी. 11 बजते-बजते यूनियन के सेनानियों का जत्था बेनीपट्टी पंहुचने लगा. 12 बजे तक हज़ारों कार्यकर्ता बेनीपट्टी पंहुच चुके थे. बढ़ते भीड़ को देख प्रशासन भी अपने स्तर पर अच्छी खासी तैयारी कर रखी थी. प्रशासन आक्रोशित भीड़ को देख जिद पर अड़ गई कि आपने आज कि बंदी को लेकर ज्ञापन में यह लिखा है कि एसडीएम साहब को आप लोग अपनी मांगो को लेकर ज्ञापन सौपेंगे. तो बेनीपट्टी अनुमंडल मेरा कार्यक्षेत्र है आज हमारा कार्यालय यहीं है, यही हम बैठेंगे, यहीं ज्ञापन दीजिये. लेकिन भीड़ आगे जाने देने की मांग कर रही थी. लगातार बहस हो रही थी दोनों तरफ से. यह खबर बेनीपट्टी बाज़ार में फैली और बाज़ार से हज़ारों लोग संसारी पोखरा के पॉइंट पर पंहुचने लगे. करीब दोपहर के 1 बज गया था. 1 बजे का सीन कुछ इस तरह का था कि जगदम्बा पेट्रोल पंप के पूरब यानी मधुबनी जाने वाली सड़क के तरफ हज़ारों यूनियन के कार्यकर्ता थे. बीच में भारी संख्या में पुलिसबल, प्रशासनिक अधिकारी और यूनियन की गाड़ी के साथ नेतृत्व कर रहे सेनानी थे. पश्चिम की तरफ यानी बेनीपट्टी बाज़ार के तरफ जाने वाली सड़क के तरफ हज़ारों का जनसमूह था जो बेनीपट्टी और अन्य गांवों से 1 बजे तक पंहुच गए थे. माहौल पूरी तरह अस्थिर था ऐसे में अविनाश भारद्वाज का माइक पर ऐलान हुआ. रैली आगे बढ़ेगी शांतिपूर्ण आगे बढ़ेगी, प्रशासन जैसे करें उनकी जिम्मेदारी है. प्रशासन को हमलोगों की बात माननी पड़ी. रैली आगे बढ़ी... नेतृत्व बेनीपट्टी के तमाम प्रशासनिक पदाधिकारी कर रहे थे. जो भी दृश्य बन रहे थे वह बेनीपट्टी के लिए नया था. जितने यूनियन के कार्यकर्ता था उससे अधिक बेनीपट्टी की जनता हमलोगों के पीछे जुड़ती गई. रैली आगे बढ़ी, सड़कें भले सुनसान थी लेकिन सड़क किनारे छतों पर लोग थे. उस भीड़ जनसमूह का स्वागत कर रहे थे जो आज तक बेनीपट्टी में कभी नही बना था.
रैली बढ़ती गई लोग जुड़ते गए. यूनियन के कार्यकर्ताओं और आम जनसमूह से सड़कें भर चुकी थी. रैली को आगे अनुमंडल कार्यालय तक जाना था. लेकिन थाने के पास अतिरिक्त पुलिसबल को लगा दिया गया. सड़क को रस्सी से बांध दिया गया ताकि भीड़ आगे नहीं बढ़ सके. क्योंकि पुलिस के सामने जो चुनौती थी वह यह थी कि प्रमुख पति अपने पालित गुंडों को किसी गुप्त स्थान पर इकट्ठा किये हुआ है इसकी खबर प्रशासन को लग गई थी. वह हमलोगों पर हमला ना करें प्रशासन को इस बात की डर थी. क्योंकि अगर ऐसा होता है तो हालात भयावह हो सकते थे. ऐसे में प्रशासन कोई भी चूक करने के लिए तैयार नहीं थी.
इस बात के मद्देनजर प्रशासन ने थाने के पास सड़क को रस्सी से बांध कर घेर लिया. रस्सी के उस तरफ जिले से बुलाये गए अतिरिक्त पुलिसबल की दंगा निरोधक टुकड़ियां थी और इस तरफ भीड़, बीच में प्रशासनिक अधिकारी.
लाख कोशिशों के वाबजूद बेनीपट्टी प्रशासन ने भीड़ को थाने से आगे नहीं जाने दिया. हमलोगों ने इस बात का हवाला भी दिया कि ज्ञापन में इस बात को इंगित किया गया है कि ज्ञापन चलकर अनुमंडल कार्यालय में एसडीएम साहब को देना है. लेकिन प्रशासन का निर्णय अंतिम था इसके आगे नही जाने देंगे. विरोध में यूनियन के कार्यकर्ता थाने के सामने मुख्य सड़क पर बैठ गए. काफी जद्दोजहद हुई लेकिन प्रशासन थाने में वार्ता करने पर अड़ी रही.
प्रशासन के इस रवैये पर सभी ने सामूहिक गिरफ्तारी देने का एलान कर दिया. सभी थाने में घुस गए. थाने में बैठने की जगह नही बची. थाना परिसर में इतनी भीड़ आज तक नही घुसी थी. पूरा परिसर धूल से धुआं-धुआं हो रहा था.
जो लोग बेनीपट्टी थाने से लेकर अनुमंडल कार्यालय तक अपने घर के छतों पर हमलोगों के आने का इंतज़ार कर रहे थे. उनलोगों तक यह खबर पंहुची की सभी ने सामूहिक गिरफ्तारी दे दी है. अगले कुछ मिनटों में भीड़ ऐसे बढ़ी की थाना से लेकर पोस्ट ऑफिस तक लोगों का जमावड़ा लग गया. सिर्फ लोगों का सिर दिख रहा था. यूनियन के कार्यकर्ता वार्ता करने के लिए तैयार नहीं थे आगे बढ़ने की जिद्द पर थे. लेकिन प्रशासन के आगे ऐसी कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही थी. इस गहमागहमी के बीच प्रशासन के साथ वार्ता हुई. लगभग में हमलोगों ने जो भी मांग उस समय की उन सभी मांगो पर किंतु परन्तु लगाते हुए आश्वासन दिया गया.
बाहर आकर थाने के माइक पर एनाउंस किया गया वार्ता हुई मांग मानी गई. इस वार्ता से कुछ लोग सन्तुष्ट थे तो कुछ लोग असन्तुष्ट थे. जिसका कारण यह था कि बहुत लोगों की इक्षा थी आगे बढ़ना चाहिए था. भीड़ की जत्था को अनुमंडल कार्यालय तक जाना चाहिए था.
इस संतुष्टि और असन्तुष्टि के बीच 6 अक्टूबर के बाद कई खास करीबी लोग ताना मारने जैसे यह कहते हुए नजर आए कि आगे क्यों नहीं बढ़े थाना से ? तुमलोगों ने गलती की. क्या होता कुछ नही होता. और भी बहुत कुछ... आज भी कुछेक के जुबानों से यह सुनने के लिए मिल जाता है.
लेकिन उनलोगों से आज एक साल बाद पूछना चाहता हूं... क्या उस दिन उस प्रशासन को चुनौती देकर आगे बढ़ने का प्रयास करते जो प्रशासन स्थिति को निपटने के लिए कुछ भी करने पर उतारू थी. स्थिति से निपटने के लिए जो प्रशासन ट्रक भरकर अतिरिक्त पुलिस बल को तैनात कर रखी थी. जो प्रशासन विधि व्यवस्था के लिए आहूत बंदी से होने वाली स्थिति को चुनौती मानकर चल रही थी. क्या वह प्रशासन भीड़ के अतिउग्र होने पर फूल बरसाती ? प्रशासन के ऊपर अगर सब कुछ आ जाता और अगर लाठीचार्ज होता तो उसमें जिसको चोटें आती, जिनका हाथ-पांव टूटता या कोई हताहत होती इसका जिम्मेदारी कौन होता ? उस भीड़ में बच्चे थे, युवा थे... यूनियन के कार्यकर्ता, आम जनता थी. क्या पुलिस की लाठी सिर्फ देखकर कुछ लोगों पर ही बरसती ?
वह भीड़ पैसे के बल पर नहीं बल्कि एक स्नेह प्यार उम्मीद के कारण आई थी हमलोगों के ईमानदारी से किये गए संघर्षों के कारण आई थी. उस भीड़ को उन्मादी बनाकर हमलोग ऐसा काम करें जिसमें दूर-दूर तक जनता का हित ना होकर अहित की संभावना अधिक हो, ऐसा काम करने की अनुमति ना तो मन-मस्तिष्क उस दिन दे रहा था ना जीवन पर्यंत देगा.
जो भी हो इतना कुछ होने के बाद ही सही शौचालय निर्माण का कार्य पूरा हुआ. जिससे आज हज़ारों लोग प्रतिदिन लाभान्वित होते हैं. मिला परिणाम - हम और हमारे कुल 8 साथियों पर कोर्ट में 13 धाराओं में मुकदमा चल रहा है. लेकिन मलाल नहीं है क्योंकि हमलोगों ने जनता के लिए लड़ाई लड़ी थी.. बेनीपट्टी की जनता खासकर व्यवसायी वर्ग ने 6 अक्टूबर 2018 को जिस तरह जीत का सुबह हमलोगों को दिया वह सुबह हमलोगों के संघर्षों की कीमत से कहीं अधिक था. वह सुबह हमलोगों के सिर एक बड़ा कर्ज है. बेनीपट्टी के जनता व व्यवसायी वर्ग द्वारा दिये गए उस कर्ज को चुकाना इस जनम में संभव नहीं है.
6 अक्टूबर 2018 को बेनीपट्टी बंद के दौरान का अन्य वीडियो -