शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

पटना मीडिया के जूनियर गणेश गायतोंडे... अपुन ही भगवान है

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पटना के स्वघोषित जूनियर गणेश गायतोंडे ने हमें फेसबुक से अनफ्रेंड कर दिया है. जबकि अभी तक उनका नाम और उनकी कंपनी का नाम भी हमनें उजागर नहीं किया है. खैर उन्होंने ब्लॉक नहीं किया है क्योंकि उनको अभी बहुत कुछ देखना है. कल से कुछ लोग यह पूछ रहे हैं कि तुम्हारे साथ कुछ हुआ है ? तो बता दें कि मेरा पूर्व का पोस्ट मेरे लिए नहीं बल्कि उन साथी मीडियाकर्मियों के लिए था जो पीड़ित हैं, ऐसे लोगों के खिलाफ बोलना भी चाह रहे हैं लेकिन मज़बूरी है. क्योंकि उन्हें स्वघोषित भगवान का डर है कि कहीं उनका कहा सच ना हो जाये और उनकी नौकरी पटना में कहीं ना लगे. ऐसे सभी पीड़ित साथी संपर्क में हैं. सभी से बात हुई है किसी ने मेरे पोस्ट को गलत नहीं बताया है. गणेश गायतोंडे एंड कंपनी के कारण हालात ऐसे हैं कि कई युवा साथियों को दशहरे में सैलरी नहीं दी गई. जिसके कारण उन्हें पटना छोड़ दूसरे शहर में नौकरी करने पर मजबूर होना पड़ा है. उनका दीवाली छठ कैसे बीतेगा वह 'असली भगवान' ही जानें.

लेकिन अभी भी मौक़ा है कुमार साहब... समझने वाले खूब समझ रहे हैं यह गणेश गायतोंडे एंड कंपनी कौन है. समय रहते गाड़ी के ड्राईवर का, ग्राफ़िक्स डिज़ाइनर का, प्रोडूसर का, कॉपी एडिटर के मजदूरी का बकाया पैसा दे दीजिये, यही आपके पास एक मात्र विकल्प है.क्योंकि यह पैसा पचता नहीं है. अपनी प्रतिष्ठा बचाइये नहीं तो अगला पोस्ट करने के बाद फेसबुक भी आपको एक ही विकल्प देगा वो होगा हमें ब्लॉक करने का.

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

पटना में मीडिया फील्ड में नौकरी की तलाश कर रहे लोग सतर्क रहें

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पटना में मीडिया फील्ड में नौकरी की तलाश कर रहे लोग सतर्क रहें. पटना में जगदीश चंद्रा के नाम पर नामी-गिरामी पत्रकारों द्वारा खबर की दुकान चल रही है. जहां पत्रकारों को अपॉइंटमेंट/जोइनिंग लेटर नहीं मिलता है. मिलता है तो सिर्फ 30 रूपये का आई कार्ड. और जब उस दुकान में नौकरी कर रहे लोगों को सच्चाई पता चलती है और वह कहीं ओर नौकरी करना चाहते हैं तो दूकान के मालिक जो खुद को बिहार की मीडिया का भगवान मान बैठे हैं उनके तरफ से यह धमकी मिलती है कि हम चाह लेंगे तो पटना में कहीं नौकरी नहीं मिलेगी आगे बहुत बातें हैं लेकिन फिलहाल इतना ही.

बेब जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय से लेकर प्रदेश तक के पदाधिकारी हमारे मित्रता सूची में हैं. आप सभी से आग्रह है कि ऐसे स्वघोषित भगवानों पर संज्ञान लें.

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

मधुबनी जिले में मॉब लिंचिंग की घटना को अंजाम देने की कोशिश की गई है

मधुबनी जिले में मॉब लिंचिंग की घटना को अंजाम देने की कोशिश की गई है दुकान को तोड़ा गया है. घटना मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड अंतर्गत बसैठ की है. जिसकी जानकारी कुछ देर पहले एक स्थानीय व्यक्ति ने फोन पर दी है.

घटना का पता किये पता चला खबर सही है. प्रशासन घटनास्थल पर कैंप कर रही है. इस बाबत कल शाम से लेकर अब तक की घटना की कई वीडियो भी साक्ष्य के तौर पर उपलब्ध हुई है. घटना मंगलवार शाम की है. जिस व्यक्ति को निशाना बनाया गया है वह शिवनगर गांव के आईटीआई कॉलेज में शिक्षक हैं. शिक्षक का नाम नरेंद्र प्रसाद है.

शिक्षक नरेंद्र के मुताबिक़ रोज की तरह मंगलवार की शाम वह कॉलेज से निकलकर घर जाने के लिए ऑटो को रुकवाए. जहां ऑटो में पहले से तीन महिलाऐं बीच की सीट पर बैठी थी. ऑटो चालक ने शिक्षक को बीच में बैठने के लिए कहा, जहां आम तौर पर चार लोग बैठते हैं. जिसका महिलाओं ने यह कहकर विरोध किया की पुरुष के साथ महिला क्यों बैठेगा ? दोनों तरफ से बहस हुई. बहस के दौरान ऑटो में पहले से पिछली सीट पर बैठे एक युवक ने भी महिला को गलत बताया. पीछे बैठा युवक अगरोपट्टी गांव का था. उस युवक ने महिला को कहा आप ही पीछे बैठ जाइए दिक्कत है तो. स्वाभाविक है महिला का विरोध भी गलत था क्योंकि ऑटो की बीच वाली सीट सिर्फ महिला या पुरुष के लिए रिजर्व नहीं होता है वहां आम तौर पर 4-5 यात्री बैठते हैं. खैर इस बहस के बीच कॉलेज के शिक्षक नरेंद्र प्रसाद और ऑटो में पीछे बैठे युवक ने ऑटो से उतरकर दूसरी ऑटो पकड़ ली.

दोनों ऑटो चलकर गंतव्य बसैठ पंहुची. जहां ऑटो से उतरकर अगरोपट्टी वाला युवक बेनीपट्टी की तरफ आगे बढ़ गया. जिस ऑटो से महिलाऐं बसैठ पहुंची थी उस ऑटोवाले ने उन महिलाओं से ऑटो रिजर्व का भाड़ा मांगा. शिक्षक नरेंद्र के आशंकाओं के मुताबिक़ ऑटो वाले ने महिलाओं से इस लिए पुरे भाड़े की डिमांड की क्योंकि उन महिलाओं के बहस कारण पहले से बैठे युवक ने भी ऑटो बदल लिया था. बसैठ में जहां ऑटो रुका वहां से दूसरा युवक जो ऑटो में महिलाओं के साथ पहले से पीछे वाली सीट पर बैठा था वह बेनीपट्टी की तरफ आगे बढ़ चुका था. महिलाओं से भाड़े मांगने के बाद महिलाओं ने शिक्षक नरेंद्र जो कि बसैठ में उतरे थे उनके पूछा कि वो दूसरा युवक कहां गया ? शिक्षक नरेंद्र ने बताया कि युवक चला गया. इसी बीच ऑटोवाले और महिलाओं के बहस के बीच में नरेंद्र भीड़ का शिकार हो गये. भीड़ ने मामला को छेड़खानी का रूप दे दिया और महिलाओं के शुभचिंतक बन भीड़ शिक्षक नरेंद्र पर टूट पड़ी. भीड़ ने उनके साथ जमकर मारपीट की. भीड़ बढ़ता देख जान बचाने के लिए नरेंद्र पास के एक होटल में घुस गये. जिसके पीछे 40-50 लोग थे. शिक्षक ने बसैठ चौकी को इस बात की सूचना दी. तब तक उनका पीछा करते हुए भीड़ ने दूकान पर पंहुचकर जमकर तोड़फोड़ की जिसका वीडियो भी है. शिक्षक रात भर जान बचाने के लिए छुपे रहे. मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया ज सकता है कि कल रात में दुकानें बंद हो गई, दिन में पूरा बाज़ार सुनसान रहा.

प्रशासन घटना को मामूली घटना बताई है. शिक्षक अभी भी भयभीत है. लेकिन क्या अगर शिक्षक भीड़ के हवाले हो जाते तो उसकी जान बच पाती ? अगर शिक्षक को मार दिया जाता तो हालात क्या होती ?

आम तौर ऐसे विवादों पर लिखने से पहले सोचता हूं. लेकिन आज शिक्षक नरेंद्र इसके शिकार हुए हैं क्या पता कल हम और आप भी ऐसी भीड़ का शिकार हों इस आशंकाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस मामले में मुख्य कड़ी वह युवक जो अगरोपट्टी का था वह और ऑटो चालक अहम है. सभी आस-पास के ही रहे होंगे. इस आधार पर दोनों से बयान लेकर मामले की हकीकत का पता चल सकता है. साथ ही वीडियो में भीड़ साफ़ दिख रही है जो पुलिस को भी हड़काती हुई नजर आ रही है.

आखिर भीड़ का मकसद क्या था ? प्रशासन इस मामले में वीडियो देखकर व स्थानीय लोगों का बयान लेकर सभी दोषियों पर मॉब लिंचिंग की घटना को अंजाम देने की कोशिश की जुर्म में नामजद मुकदमा करें. शिक्षक को सुरक्षा मुहैया करवाएं यही अनुरोध है. अन्यथा यही समझा जायेगा प्रशासन मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं के घटित होने का इंतज़ार कर रही है.

- घटना से जुड़ी कई वीडियो के साथ शिक्षक नरेंद्र का बयान भी इस पोस्ट में संलग्न है.

सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

मंत्री जी उच्च विद्यालय खोलने से पहले शिक्षक बहाल करवा दीजिये

बिहार सरकार के मंत्री व बेनीपट्टी के पूर्व विधायक विनोद नारायण झा बेनीपट्टी विधानसभा के दौरे पर हैं. आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर गांधी जी के नाम पर पद यात्रा कर रहे हैं.

इसी क्रम में अखबार में उनका बयान छपा है कि हर पंचायत में उच्च विद्यालय खुलेंगे. पेपर कटिंग कमेंट बॉक्स में है. इस पेपर कटिंग को उनके समर्थक सोशल मीडिया पर जमकर शेयर कर रहे हैं. समर्थक अपना काम बखूबी कर रहे हैं उनसे शिकायत नहीं है. क्योंकि समर्थक का काम नेताजी जिंदाबाद करना ही है, तभी सेल्फी नसीब होती है.

इस पोस्ट में एक वीडियो अटैच किया गया है. वीडियो मंत्री जी के विधानसभा क्षेत्र के जरैल गांव का है. जहां उच्च विद्यालय तो है लेकिन उद्घाटन के दिन से अब तक एक भी शिक्षक यहां बहाल नहीं हुए. उद्घाटन स्वयं मंत्री विनोद ना झा ने किया था. लेकिन करोड़ों का मकान खंडहर हो रहा है. इसी तरह इनके विधानसभा क्षेत्र बेनीपट्टी मुख्यालय में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो है लेकिन 5 साल से अधिक से वहां महिला चिकित्सक नहीं है. शर्म नहीं आती है इन लोगों को ?

शर्म आती है तो हर पंचायत में नये उच्च विद्यालय निर्माण के सपने दिखाने से पहले जरैल उच्च विद्यालय में शिक्षक बहाल करवा दें.

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

6 अक्टूबर बेनीपट्टी बंद... याद शायद होगा ही

6 अक्टूबर बेनीपट्टी बंद... याद शायद होगा ही. नहीं तो पोस्ट में दिया हुआ वीडियो देखिये ठीक एक साल पहले 6 अक्टूबर 2018 के सुबह 8 बजे की वीडियो है.

दरअसल एक पुरानी मांग थी बेनीपट्टी मुख्यालय में सार्वजनिक शौचालय निर्माण की. बेनीपट्टी विधानसभा भी है, अनुमंडल भी है. शिक्षा का हब है हज़ारों छात्र पढ़ने आते हैं. ऐसे में मुख्य बाजार में जीर्णशीर्ण पड़े सार्वजनिक शौचालय के जीर्णोद्धार को लेकर आंदोलन हुआ था. कई दफे सड़क जाम, वार्ता हुआ था. काम कच्छप गति में बढ़ रहा था साल बीत गए आश्वासन के यह मंजूर नहीं था. इतंज़ार करते-करते अचानक आक्रोश बढ़ा और कुछ साथियों के साथ बेनीपट्टी प्रखंड कार्यालय पर धावा बोल दिए. काम काज सब ठप करवा दिया गया. एक-एक कर्मी को कार्यालय से बाहर निकाल दिया गया. बीडीओ मनोज कुमार जो अभी भी हैं ही उनको खूब गलियाया गया. चुनाव को लेकर एक बैठक चल रही थी, बीडीओ साहब हौले में ले रहे थे, मिलने आ नहीं रहे थे तो सभी घुस गए अंदर मीटिंग हॉल में और जमकर कीर्तन हुआ. ऐसा आरोप हमलोगों पर लगा था.

बीडीओ साहब हम लोगों के आक्रोशित व्यवहार को देखकर ब्लॉक को छोड़ चलते बनें. हमलोग धरने पर बैठ गए इस बात को लेकर कि बीडीओ मनोज कुमार ने बात करने की पहल क्यों नही की. धरना स्थल पर करीब 30-40 साथी रहे होंगे रात हुई, सुबह आई. इस दौरान भाषणों में बेनीपट्टी प्रशासन, विधायक, सांसद, बेनीपट्टी प्रखंड प्रमुख सोनी देवी और उनके पति का नाम बार-बार आ रहा था. क्योंकि पंचम वित्त आयोग के तहत बनने वाले सार्वजनिक शौचालय का शिलान्यास विधायक भावना झा के हाथों प्रमुख सोनी देवी और प्रमुख पति ने ही करवाया था.

अब तक प्रमुख पति ने बेनीपट्टी इलाके में खुद का नाम लेकर जिंदाबाद करने वाले बहुत पाले थे लेकिन सिर्फ जिंदाबाद ही नहीं बल्कि जनता से धोखा करने पर मुर्दाबाद करने वाले कुछ जिंदा लोग भी बेनीपट्टी में पैदा लिए हुए हैं यह उस दिन प्रमुख और उसके पति को पता चला.

धरने से प्रशासन पर बढ़ते दवाब को देखते हुए पहले तो प्रमुख पति ने सब कुछ सही करने की कोशिश कि क्योंकि शौचालय निर्माण कार्य में शिथिलता के जिम्मेदार कहीं ना कहीं प्रमुख ही थी. जिसको लेकर प्रमुख पति ने ब्लॉक में तालाबंदी और धरने की सुबह शौचालय निर्माण का कार्य शुरू करवाना चाहा भी. लेकिन चंद घंटों में बहुत कुछ मुनासिब नहीं था, ठेकेदार हमलोगों से लगातार बात कर रहे थे लेकिन धरने पर बैठे कोई भी व्यक्ति मानने के लिए तैयार नहीं थे. इधर हम लोगों का धरना और उधर प्रशासन का दवाब. प्रखंड कार्यालय का एक भी कमरा अगले सुबह नहीं खुला. सभी कर्मी सड़क पर घूम रहे थे. क्योंकि कार्यालय के बाहर हमलोग बैठे थे. ऐसे में प्रमुख पर प्रशासन का दवाब बन रहा था. क्योंकि आश्वासन और काम तो उसे ही करवाना था. लाचारगी में बेचारे अपनी फजीहत को देख कुछ जिंदाबादी जिनको रोजगार मुहैया करवाकर खुद के लिए लाठी उठवाने वाले लोगों के साथ प्रमुख पति ब्लॉक कार्यालय पर पंहुचकर पहले तो हमलोगों से बात की. फिर वार्ता में असफल हुए तो सनक ऐसी चढ़ी कि हम लोगों पर धरना स्थल से हटाने के लिए जानलेवा हमला कर दिया. कितनों का मोबाइल लूटा, पैसे छीने, चप्पल चुराए.

धरने पर 20-25 साल के लड़के थे, सभी अपनी जान बचाकर निकले वहां से. प्रमुख पति जो दर्जनों जिंदाबादी लठैतों को लेकर आये थे उन लोगों ने जमकर लाठियां हथियार भांजी. सारी घटना सीसीटीवी में कैद हुई.
बता दें कि यह बदला इसलिए भी था क्योंकि इन लठैतों के रहते हुए एक दिन पहले हमलोग प्रमुख सोनी देवी का साड़ी फाड़ दिए थे. थाने में ऐसा आवेदन गया था प्रमुख पति के तरफ से कि हुजूर माय बाप ऐसा-ऐसा हुआ है. यानी प्रमुख पति अपनी पत्नी का रक्षा नही कर सके थे एक दिन पहले. जिसके खींझ में प्रमुख पति ने घातक कदम उठाया. हमलोगों पर हमला कर दिया. हमलोग ब्लॉक परिसर से हटकर बगल के महिला कॉलेज पंहुचे. माहौल गर्म हुआ तो प्रशासन के अधिकारी भी पहुंचे. जोर-आजमाइश बहस हुई आवेदन लिखी गई और प्रमुख पति और अन्य कुछ लोगों के खिलाफ नामजद एफआईआर हमलोगों ने कर दी. एफआईआर में एक फोर व्हलीर स्कार्पियो गाड़ी का भी हमलोगों ने जिक्र किया कि इस नम्बर की गाड़ी से यह लोग आए थे हमलोगों पर हमला करने. साथ ही एफआईआर में इस बात का जिक्र प्रमुखता से किया गया था कि ब्लॉक परिसर में हुई घटनाक्रम का सीसीटीवी में कैद है.

प्रमुख पति के खिलाफ सभी के मन में आक्रोश था जो कम होने का नाम नहीं ले रहा था. तत्काल जितने भी लोग जुटे सभी फिर थाने पंहुच गये और प्रमुख पति की गिरफ्तारी की मांग करने लगे. प्रशासन लाचार थी प्रशासन से ऐसा करना संभव नहीं था. जिस गाड़ी से प्रमुख पति के पलित पोषित लोग प्रखंड कार्यालय पर हमलोगों से मारपीट करने आये थे, वह गाड़ी शान के साथ उसी समय थाने में घुसी जिसे बांकी साथियों ने पहचान लिया और कड़ा विरोध दर्ज करवाकर गाड़ी को थाने में लगवाया. बेनीपट्टी थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष हरेराम साह गाड़ी क थाने में लगवाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे जबकि एफआईआर में हमलोगों ने उस गाड़ी का नम्बर भी दिया था. और जब थाने में वह गाड़ी आई थी तो गाड़ी में लाठी-डंडे असलहे रखे हुए थे. थानाध्यक्ष को हमलोगों ने दिखाया भी... उलटे थानाध्यक्ष हमलोगों का वीडियो बनाने लगे इस ध्येय से कि हमलोग डर जाएं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

दवाब बढ़ता देख थानाध्यक्ष को गाड़ी को जब्त करना पड़ा. अगले दिन अखबार में भी छपी की गाड़ी को जब्त कर लिया गया था. लेकिन उसी दिन ना जाने क्या खेल हुआ प्रशसान ने चोरी छिपे गाड़ी को छोड़ दिया. जबकि हमलोगों के तरफ से दिए गये आवेदन में उक्त गाड़ी का भी जिक्र किया गया था कि इसी गाड़ी से लाठी डंडे और असलहे लेकर वो लोग आये थे. जो कि गाड़ी को जब्त करने वक्त हमलोगों ने थानाध्यक्ष को दिखाया भी था और इसका वीडियो भी बनाया था. बाद में जब हमलोगों ने गाड़ी छोड़ने को लेकर थानाध्यक्ष से सवाल किया तो तरह-तरह के कानूनी ज्ञान पढ़ा दिया गया. सीसीटीवी की जब हमलोगों ने मांग की तो टेक्निकल ज्ञान पढ़ा दिया गया. यहां तक कि हमलोगों ने यह भी कहा कि सोनी देवी की साड़ी फाड़ने की घटना भी हुई होगी तो वह सीसीटीवी में होगी इसीलिए सच्चाई सामने लाइये जनता के. लेकिन प्रशासन ने ऐसा कुछ नही किया. इस बहुत सारे लोगों का कॉल रिकॉर्ड भी किये जो सीसीटीवी के खेल बेल में संलिप्त थे.

यहां से थोड़ी-थोड़ी समझ आने लगी थी कि भैया राजनीति इतनी आसान नहीं है. सब कुछ प्रत्यक्ष है और कुछ भी अपने पक्ष में नही जा रहा हैं.

खैर बाज़ार में यह चर्चा का विषय था. हमले से सभी के मन में भय हो गया आप 30-40 लड़के थे धरना पर तो प्रमुख पति के 50-60 जिंदाबाद लठैत आये और आप लोगों के साथ मारपीट किया. कल आप 50-60 रहेंगे वह 100-110 की संख्या में आएगा. क्योंकि अब तक हम लोगों को यह अनुभव हो चुका था कि जब प्रशासन का सीसीटीवी नोटों के आगे अंधा हो सकता है तो ऐसे में कुछ भी हो सकता है.

सारी घटनाक्रम पर नजर बनाए यूनियन का ऊपर से आदेश आया... बेनीपट्टी बंद.

एक बार यह सुनकर हमलोग आवाक रह गए. बेनीपट्टी बंद ? यह कैसे सम्भव होगा. जिस मुद्दे के लिए हमलोग लड़ रहे थे उस मुद्दे पर जब हमलोग धरना प्रदर्शन, सड़क जाम करते हैं तो उसमें 50-100 लोग रहते हैं ऐसे में बेनीपट्टी बंद... क्या लोग समर्थन देंगे ? यह सवाल दिमाग में बार-बार आ रहा था.

1 अक्टूबर को यूनियन के तरफ से पूर्व में विभिन्न मुद्दों पर मिथिला बंद का आह्वान किया जा चुका था. जिसको सफल बनाने में सभी लगे हुए थे. यह सफल हुआ फिर सभी 6 अक्टूबर की तैयारी में सभी जुट गये.

2 अक्टूबर को सागर और प्रिय रंजन बेनीपट्टी पहुंचे. ऑन पेपर प्लान तैयार हुआ. बेनीपट्टी प्रशासन को 6 अक्टूबर की बंदी का ज्ञापन नहीं देकर डीएम मधुबनी को सौंपा गया. 3 अक्टूबर को ऑटो पर माइक सेट कर अड़ेर से बेनीपट्टी के संसारी पोखर होते हुए अंबेडकर चौक यानी बेनीपट्टी के शुरुआती छोड़ से अंतिम छोड़ तक यह ऐलान हुआ 6 अक्टूबर को बेनीपट्टी बंद रहेगा. 3 अक्टूबर बेनीपट्टी बेहटा बाज़ार का दिन था. लोग बाज़ार में चींटी की तरह भरे हुए थे. ऐसी भीड़ के बीच से ऑटो और उसके पीछे दर्जन भर युवा बंद का आक्रोशपूर्ण घोषणा कर रहे थे. घोषणा में जिस तरह से शब्द का का इस्तेमाल किया जा रहा था वह बेनीपट्टी को समझने-जानने वाले लोगों को अपेक्षित नही था. सब कुछ नया था.

तल्ख लहजे में जोरदार ऐलान हुआ. 3 दिन बाद यानी 6 अक्टूबर को बंद का ऐलान था. बाज़ार में गहमागहमी माइक पर जिस तरह से एनाउंस हो रहा था उसी से शुरू हो गई. माहौल टाइट हो रहा था. खबर डीएसपी साहब को लगी. डीएसपी साहब बेनिपट्टी से बाहर थे. उन्होंने मेरे नम्बर पर कॉल करके कहा - क्या करवा रहे हो बिकास ? यह सही नही है. मैं सारी बातों को जानते हुए भी बाज़ार में हो रहे एनाउंस को लेकर उनके सामने फोन पर अनभिज्ञता जाहिर की. मैनें कहा - सर हम तो घर पर सोये हुए हैं. हालांकि अगर ऐसे एनाउंस हो रहा है तो यह गलत है, जो साथी ऐसा कर रहे हैं मैं समझाने का प्रयास करता हुं. वैसे सुने हैं कि डीएम साहब को ज्ञापन दी जा चुकी है. इतना बस बात हुआ डीएसपी साहब से. लेकिन मैनें किसी भी साथी को इस बात की जानकारी नही दी कि डीएसपी साहब का कॉल आया था और उन्होंने घोर आपत्ति की है.

कुछ घन्टों बाद सभी साथ एनाउंसमेंट के बाद चयनित जगह पर पहुंचे जहां सबको रात को इकट्ठा होना रहता था. जहां मैनें डीएसपी साहब के आये हुए कॉल के बारे में जिक्र किया.

बाज़ार में हुए एनाउंस ने नए चर्चे को जन्म दे दिया था. सभी के जुबान पर यही मामला था. चारों तरफ माहौल टाइट था. ब्लॉक पर हुई घटना के बारे में बाज़ार में लोग लगातार चर्चा कर ही रहे थे, अब आशंका में थे 6 अक्टूबर को क्या होगा ? कितने लोग आएंगे बाहर से ? क्या लोग समर्थन देंगे बंदी को ? क्या लोग दुकानें बंद रखेंगे ?

इस बीच 3 अक्टूबर को बाज़ार में हुए एनाउंस के बाद प्रशासन पूरी तरह दवाब में आ गई. 3 अक्टूबर की रात से मेरे घर पुलिस के अधिकारियों का आना जाना तेज हुआ. पुलिसकर्मी या कोई इंसान बुरा नही होता उसका वक्त और हालात बुरा होता है. कुछ ऐसा ही प्रतीत हुआ जब कुछ पुलिसकर्मी अकेले घर पर आते थे और ऑफिसियली अपनी ड्यूटी के कामों के अलावे अनऑफिसियली हो रहे घटनाक्रम को लेकर सारी बातों को साझा करते थे. हम बार-बार दोहराते गिरफ्तारी क्यों नही हो रही है ? जो जवाब मिला वह बड़ी सीख दे गया. उसका जिक्र यहां नहीं किया जा सकता है.

खैर हमनें उसी रात से घर पर सोना छोड़ दिया और बांकी साथियों के साथ अज्ञात ठिकाने पर रहने लगा. 3 अक्टूबर को एनाउंसमेंट के बाद खबर यह भी मिली की प्रशासन इस स्थिति से निपटने के लिए यूनियन के अग्रणी साथी जो इसमें लीड कर रहे थे उनको 6 अक्टूबर तक के लिए गिरफ्तार भी कर सकती है शांति व्यवस्था भंग करने की साजिश रचने के आरोप में. ऐसे में हमलोगों ने ठिकाना बदल लिया. योजना पर काम चल रहा था. एनाउंसमेंट से हुए माहौल टाइट की खबर प्रमुख पति और उनके लोगों तक पंहुची, खलबली बढ़ी.

3 तारीख को हुए एनाउंसमेंट के बाद प्रशासन के निशाने पर हमलोग थे. इस स्थिति से निपटने के लिए बखूबी प्रशासन अपना काम कर रही थी. ऐसे में 3 तारीख के बाद हमलोगों ने बेनीपट्टी बाज़ार में विजिबलिटी कम कर दी.

इस सबके बीच 4 तारीख बीत गया और इस बीच में मेरे और मेरे बांकी साथियों के घर पुलिसकर्मियों का आना जाना जारी रहा. पुलिसकर्मियों का घर पर पहुंचने का ध्येय कुछ गलत नही था. बस वह बार-बार मां-पापा को यह समझा रहे थे कि इससे क्या होगा ? भविष्य खराब हो जाएगा सब लड़का का... जरा सबको समझाइए-बुझाइए आदि इत्यादि.

बेनीपट्टी में पारंपरिक बंदी जो कि राजनीतिक दलों द्वारा या आरक्षण जैसे विषयों पर अब तक हुआ था जिसमें कई में मैं खुद भी प्रत्यक्ष गवाह रहा था. कुछ वैसा ही बंदी का अनुमान व्यक्तिगत तौर पर हम 6 अक्टूबर को लेकर भी कर रहे थे. यानी आपका भीड़ देखकर दुकानदार शटर तो गिराएंगे, लेकिन भीड़ आगे बढ़ती ही पीछे से दुकान की शटर उठ जाएंगी. मतलब आपके दवाब से दुकानें बंद तो होगी लेकिन दुकानदार व्यवसायी नैतिक समर्थन नहीं करेंगे.

बता दें कि प्रमुख पति का राजनीतिक कैरियर करीब एक दशक से अधिक का था. फिलहाल वह मेन स्ट्रीम राजनीति में खुद का भविष्य तलाश रहे हैं. ऐसे में अपनी राजनीतिक धौस को जिंदा रखने के लिए वह सभी प्रयास कर रहे थे. बेनीपट्टी एक विधानसभा है और बेनीपट्टी मुख्यालय के तमाम दुकानदारों से 5 अक्टूबर की रात प्रमुख पति ने अपने जिंदाबादी लोगों के साथ घूमकर एक-एक दुकान जाकर यह ऐलान किया कि आप लोग मेरे रहते चिंता न करें कल बेनीपट्टी बंद में अपनी दुकान बंद ना करें, हम है आपके साथ. हम देंगे आपको सुरक्षा. यहां तक कि बेनीपट्टी पोस्ट ऑफिस के पास एक मुस्लिम चाचा हैं उनको पैसा तक ऑफर किया कि खुद की दुकान खुली रखना और दूसरों को भी बोलना खोलने. लेकिन उनका जवाब था - तुम हमारे मालिक नहीं हो. ऐसा सुनने में आया.

लेकिन आज भी इन सब बातों को लिखते हुए मन में फिर से वही सवाल आता है... जो व्यक्ति सैकड़ों को रोजगार दे रहा है.. जिसके पास नामी-बेनामी संपत्ति की कमी नहीं है.. जो अपनी पत्नी को प्रमुख बनाने के लिए बेनीपट्टी प्रखंड के सभी 46 पंचायत समितियों को एक साथ मैनेज कर सकता है, पत्नी को निर्विरोध प्रमुख निर्वाचित करवा सकता है. उस आदमी कि ऐसी भी हालत हो सकती है कि 20-25 साल के कुछ युवाओं के सामने वह खुद को इतना असुरक्षित महसूस करने लगा कि उसको भाड़े पर गुंडे बुलवाने पड़े ? ऐसी हैसियत कि दुकानदारों को दुकान खोलने के लिए बोले तो वह बंद कर लें ? वह अपनी लड़ाई 20-25 साल के कुछ युवाओं से ठानें ? वह इतना बेबस हो जाए कि अपनी पत्नी कि साड़ी फाड़ने का झूठा आरोप लगाए ? फिर किस बात के दबंग... फिर किस बात कि मर्दानगी ? किस काम की संपत्ति ?

खैर... अब प्रशासन के लिए यह चुनौती बन चुका था. क्योंकि प्रमुख पति अपनी राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए हर यत्न प्रयत्न कर रहा था. पहले तो रात में दुकानदारों से मिलकर 6 अक्टूबर को दुकान खोलने की आग्रह की. यह सफल होता हुआ नहीं देख पैसे के बल पर बनाये गये सैकड़ों जिन्दाबादी लठैतों को बेनीपट्टी बुलाया गया जो प्रमुख पति के दिए हुए रोजगार से अपना परिवार चलाते हैं. यह खबर प्रशासन को लगी, इसके बाद प्रशासन की दर्जनों गाड़ियां रात के 11 बजे से 2 बजे के बीच बेनीपट्टी की सड़क पर सायं-सायं सायरन बजाते हुए मार्च करने लगी. हमलोग रात में एक मंदिर पर रुके थे. प्रशासन की गाड़ियों का काफिला जिस तरह से बेनीपट्टी में रात में दौड़ रहा था उसको देखते हुए हमलोगों ने यह सोचकर फिर से ठिकाना बदल लिया कि क्या पता प्रशासन किसी अनहोनी के आशंका से स्थिति को निपटने के लिए हमलोगों को रात में ही गिरफ्तार ना कर लें.

खैर सुबह हुई... जबरदस्त हुई. वह सुबह 6 अक्टूबर 2018 की थी. जब सूरज की किरणों की पौ फट रही थी उससे पहले बेनीपट्टी के एक-एक चौराहे पर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई. कदम दर कदम पुलिस की कई टुकड़ियां बेनीपट्टी में मार्च करने लगी. 7 बजे तक इक्का दुक्का चाय की दुकानें भी जो खुली थी वह भी बंद हो गई. क्योंकि सड़क पर लोग थे ही नहीं. ऐसा बेनीपट्टी के इतिहास में पहली बार हुआ था. बेनीपट्टी में हुए कई बंदी का हिस्सा में खुद भी रहा हूं लेकिन जो दृश्य बेनीपट्टी में 6 अक्टूबर 2018 को था वह अविश्वसनीय था सड़कें पूरी तरह सुनसान थी. सड़कों पर सिर्फ पुलिस की गाड़ियां थी, सैकड़ों पुलिस वाले थे. यही सुनसान सड़कें बंद दुकानें हमारी सबसे बड़ी जीत थी.

समय बढ़ता गया करीब 9 बजे तक संसारी पोखरा के पास 20-25 सेनानी जुटे थे. बाज़ार में सन्नाटा था. लोग-एक दूसरे से पूछ रहे थे कहां है एमएसयू वाले ? कब आएगा मार्केट तरफ ?

देर हो रही थी लोग आशंकाओं से घिर रहे थे. क्योंकि देर काफी हो गई थी. 11 बजते-बजते यूनियन के सेनानियों का जत्था बेनीपट्टी पंहुचने लगा. 12 बजे तक हज़ारों कार्यकर्ता बेनीपट्टी पंहुच चुके थे. बढ़ते भीड़ को देख प्रशासन भी अपने स्तर पर अच्छी खासी तैयारी कर रखी थी. प्रशासन आक्रोशित भीड़ को देख जिद पर अड़ गई कि आपने आज कि बंदी को लेकर ज्ञापन में यह लिखा है कि एसडीएम साहब को आप लोग अपनी मांगो को लेकर ज्ञापन सौपेंगे. तो बेनीपट्टी अनुमंडल मेरा कार्यक्षेत्र है आज हमारा कार्यालय यहीं है, यही हम बैठेंगे, यहीं ज्ञापन दीजिये. लेकिन भीड़ आगे जाने देने की मांग कर रही थी. लगातार बहस हो रही थी दोनों तरफ से. यह खबर बेनीपट्टी बाज़ार में फैली और बाज़ार से हज़ारों लोग संसारी पोखरा के पॉइंट पर पंहुचने लगे. करीब दोपहर के 1 बज गया था. 1 बजे का सीन कुछ इस तरह का था कि जगदम्बा पेट्रोल पंप के पूरब यानी मधुबनी जाने वाली सड़क के तरफ हज़ारों यूनियन के कार्यकर्ता थे. बीच में भारी संख्या में पुलिसबल, प्रशासनिक अधिकारी और यूनियन की गाड़ी के साथ नेतृत्व कर रहे सेनानी थे. पश्चिम की तरफ यानी बेनीपट्टी बाज़ार के तरफ जाने वाली सड़क के तरफ हज़ारों का जनसमूह था जो बेनीपट्टी और अन्य गांवों से 1 बजे तक पंहुच गए थे. माहौल पूरी तरह अस्थिर था ऐसे में अविनाश भारद्वाज का माइक पर ऐलान हुआ. रैली आगे बढ़ेगी शांतिपूर्ण आगे बढ़ेगी, प्रशासन जैसे करें उनकी जिम्मेदारी है. प्रशासन को हमलोगों की बात माननी पड़ी. रैली आगे बढ़ी... नेतृत्व बेनीपट्टी के तमाम प्रशासनिक पदाधिकारी कर रहे थे. जो भी दृश्य बन रहे थे वह बेनीपट्टी के लिए नया था. जितने यूनियन के कार्यकर्ता था उससे अधिक बेनीपट्टी की जनता हमलोगों के पीछे जुड़ती गई. रैली आगे बढ़ी, सड़कें भले सुनसान थी लेकिन सड़क किनारे छतों पर लोग थे. उस भीड़ जनसमूह का स्वागत कर रहे थे जो आज तक बेनीपट्टी में कभी नही बना था.

रैली बढ़ती गई लोग जुड़ते गए. यूनियन के कार्यकर्ताओं और आम जनसमूह से सड़कें भर चुकी थी. रैली को आगे अनुमंडल कार्यालय तक जाना था. लेकिन थाने के पास अतिरिक्त पुलिसबल को लगा दिया गया. सड़क को रस्सी से बांध दिया गया ताकि भीड़ आगे नहीं बढ़ सके. क्योंकि पुलिस के सामने जो चुनौती थी वह यह थी कि प्रमुख पति अपने पालित गुंडों को किसी गुप्त स्थान पर इकट्ठा किये हुआ है इसकी खबर प्रशासन को लग गई थी. वह हमलोगों पर हमला ना करें प्रशासन को इस बात की डर थी. क्योंकि अगर ऐसा होता है तो हालात भयावह हो सकते थे. ऐसे में प्रशासन कोई भी चूक करने के लिए तैयार नहीं थी.

इस बात के मद्देनजर प्रशासन ने थाने के पास सड़क को रस्सी से बांध कर घेर लिया. रस्सी के उस तरफ जिले से बुलाये गए अतिरिक्त पुलिसबल की दंगा निरोधक टुकड़ियां थी और इस तरफ भीड़, बीच में प्रशासनिक अधिकारी.

लाख कोशिशों के वाबजूद बेनीपट्टी प्रशासन ने भीड़ को थाने से आगे नहीं जाने दिया. हमलोगों ने इस बात का हवाला भी दिया कि ज्ञापन में इस बात को इंगित किया गया है कि ज्ञापन चलकर अनुमंडल कार्यालय में एसडीएम साहब को देना है. लेकिन प्रशासन का निर्णय अंतिम था इसके आगे नही जाने देंगे. विरोध में यूनियन के कार्यकर्ता थाने के सामने मुख्य सड़क पर बैठ गए. काफी जद्दोजहद हुई लेकिन प्रशासन थाने में वार्ता करने पर अड़ी रही.

प्रशासन के इस रवैये पर सभी ने सामूहिक गिरफ्तारी देने का एलान कर दिया. सभी थाने में घुस गए. थाने में बैठने की जगह नही बची. थाना परिसर में इतनी भीड़ आज तक नही घुसी थी. पूरा परिसर धूल से धुआं-धुआं हो रहा था.

जो लोग बेनीपट्टी थाने से लेकर अनुमंडल कार्यालय तक अपने घर के छतों पर हमलोगों के आने का इंतज़ार कर रहे थे. उनलोगों तक यह खबर पंहुची की सभी ने सामूहिक गिरफ्तारी दे दी है. अगले कुछ मिनटों में भीड़ ऐसे बढ़ी की थाना से लेकर पोस्ट ऑफिस तक लोगों का जमावड़ा लग गया. सिर्फ लोगों का सिर दिख रहा था. यूनियन के कार्यकर्ता वार्ता करने के लिए तैयार नहीं थे आगे बढ़ने की जिद्द पर थे. लेकिन प्रशासन के आगे ऐसी कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही थी. इस गहमागहमी के बीच प्रशासन के साथ वार्ता हुई. लगभग में हमलोगों ने जो भी मांग उस समय की उन सभी मांगो पर किंतु परन्तु लगाते हुए आश्वासन दिया गया.

बाहर आकर थाने के माइक पर एनाउंस किया गया वार्ता हुई मांग मानी गई. इस वार्ता से कुछ लोग सन्तुष्ट थे तो कुछ लोग असन्तुष्ट थे. जिसका कारण यह था कि बहुत लोगों की इक्षा थी आगे बढ़ना चाहिए था. भीड़ की जत्था को अनुमंडल कार्यालय तक जाना चाहिए था.

इस संतुष्टि और असन्तुष्टि के बीच 6 अक्टूबर के बाद कई खास करीबी लोग ताना मारने जैसे यह कहते हुए नजर आए कि आगे क्यों नहीं बढ़े थाना से ? तुमलोगों ने गलती की. क्या होता कुछ नही होता. और भी बहुत कुछ... आज भी कुछेक के जुबानों से यह सुनने के लिए मिल जाता है.

लेकिन उनलोगों से आज एक साल बाद पूछना चाहता हूं... क्या उस दिन उस प्रशासन को चुनौती देकर आगे बढ़ने का प्रयास करते जो प्रशासन स्थिति को निपटने के लिए कुछ भी करने पर उतारू थी. स्थिति से निपटने के लिए जो प्रशासन ट्रक भरकर अतिरिक्त पुलिस बल को तैनात कर रखी थी. जो प्रशासन विधि व्यवस्था के लिए आहूत बंदी से होने वाली स्थिति को चुनौती मानकर चल रही थी. क्या वह प्रशासन भीड़ के अतिउग्र होने पर फूल बरसाती ? प्रशासन के ऊपर अगर सब कुछ आ जाता और अगर लाठीचार्ज होता तो उसमें जिसको चोटें आती, जिनका हाथ-पांव टूटता या कोई हताहत होती इसका जिम्मेदारी कौन होता ? उस भीड़ में बच्चे थे, युवा थे... यूनियन के कार्यकर्ता, आम जनता थी. क्या पुलिस की लाठी सिर्फ देखकर कुछ लोगों पर ही बरसती ?

वह भीड़ पैसे के बल पर नहीं बल्कि एक स्नेह प्यार उम्मीद के कारण आई थी हमलोगों के ईमानदारी से किये गए संघर्षों के कारण आई थी. उस भीड़ को उन्मादी बनाकर हमलोग ऐसा काम करें जिसमें दूर-दूर तक जनता का हित ना होकर अहित की संभावना अधिक हो, ऐसा काम करने की अनुमति ना तो मन-मस्तिष्क उस दिन दे रहा था ना जीवन पर्यंत देगा.

जो भी हो इतना कुछ होने के बाद ही सही शौचालय निर्माण का कार्य पूरा हुआ. जिससे आज हज़ारों लोग प्रतिदिन लाभान्वित होते हैं. मिला परिणाम - हम और हमारे कुल 8 साथियों पर कोर्ट में 13 धाराओं में मुकदमा चल रहा है. लेकिन मलाल नहीं है क्योंकि हमलोगों ने जनता के लिए लड़ाई लड़ी थी.. बेनीपट्टी की जनता खासकर व्यवसायी वर्ग ने 6 अक्टूबर 2018 को जिस तरह जीत का सुबह हमलोगों को दिया वह सुबह हमलोगों के संघर्षों की कीमत से कहीं अधिक था. वह सुबह हमलोगों के सिर एक बड़ा कर्ज है. बेनीपट्टी के जनता व व्यवसायी वर्ग द्वारा दिये गए उस कर्ज को चुकाना इस जनम में संभव नहीं है.

6 अक्टूबर 2018 को बेनीपट्टी बंद के दौरान का अन्य वीडियो -

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

तीन दोस्त एक साथ बाइक से मेला घुमने निकले थे...



तीन दोस्त एक साथ बाइक से मेला घुमने निकले थे. तीन में से दो युवक के मरणासन हालत में सड़क पर खून से लथपथ होने की खबर फैलती है. परिजन घटनास्थल पर पहुंचते हैं. जहां से तीसरा दोस्त गायब रहता है जबकि वही दोस्त ने मृतकों के ग्रामीण को फोन कर घटना की सूचना दी थी. जबकि उस दोस्त के पास अपने दोनों दोस्त के परिवार वालों का नंबर था. आनन-फानन में दोनों युवक को अस्पताल ले जाया जाता है जहां दोनों को मृत घोषित कर दिया जाता है.

कुछ देर बाद एक मृतक के मोबाइल पर किसी लड़की/महिला का फ़ोन आता है. फोन मृतक का भाई रिसिभ करता है उधर से लड़की/महिला बोलती है - फलां को भी मार लग गया ? आश्चर्य से मृतक का भाई कहता है आप कौन ? लड़की/महिला पहले तो खुद को मधुबनी जिले के गेनौर गांव की रहने वाली बताती है और जब उसे यह बताया जाता है कि फलां अस्पताल में भर्ती है पानी चढ़ रहा है तो जवाब मिलता है मेरा घर बेनीपट्टी है और फोन कट जाता है. (कॉल रेकॉर्डिंग मौजूद है) अगले दिन अखबार में खबर छपती है दो बाइक की आपस में टक्कर में दो की मौत हो गई जिसकी पुष्टि थाना प्रभारी ने की है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ऐसा लिखा गया है कि परिजन तो दूर किसी डॉक्टर को भी समझ में नहीं आ रहा. मामला मधुबनी जिले के बेनीपट्टी अनुमंडल का है. दोनों मृतक की उम्र 34-35 वर्ष है. मृतक में से एक को चार बच्चे जिसमें तीन बेटी और एक बेटा है. वहीं दुसरे मृतक के दो बेटे और दो बेटी है. इतना ही समझने पढने के बाद इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रशासन के कागज़ पर दो बाइक की ऐसी टक्कर हुई कि कानून की धज्जी उड़ी और दो युवकों का परिवार उजर गया.

इन दोनों बाइक की आपस में टक्कर हुई और दो व्यक्ति की मौत हो गई. जबकि दोनों दोस्त एक दिशा में आ रहे थे फिर आपस में टक्कर कैसे होगी... क्या यह मानने वाली बात है ?

रविवार, 15 सितंबर 2019

बेनीपट्टी पुलिस ने एक पिक अप वैन गोल मरीच...

बेनीपट्टी पुलिस ने एक पिक अप वैन गोल मरीच/काली मिर्च अनलोडिंग के वक्त तीन आदमी को हिरासत में लिया है. अभी एक अन्य व्यक्ति ने फोन कर इस बात की जानकारी भी दी और आशंका व्यक्त की है कि स्थानीय कोई मुखिया जी हैं जो 3 लाख में मामला सलटाने के प्रयास में लगे हुए हैं. सुरक्षा के लिहाज से व्यक्ति ने नाम बताने से इनकार किया, लेकिन व्यक्ति ने प्रशासनिक पदाधिकारियों का नाम लेते हुए मामला रफा-दफा करने में संलिप्तता होने की आशंका व्यक्त की है. उस व्यक्ति ने बताया एसपी महोदय को भी इस बात की जानकारी दी गई है लेकिन बेनीपट्टी में मामले का डील हो रहा है कहीं.

जवाब में उस व्यक्ति को हमनें बस इतना कहा है कि अगर गोल मिर्च पकड़ी गई है, आदमी हिरासत में है, गाड़ी थाने में जब्त है तो ऐसे अद्भुत संयोग में मामला रफा-दफा होने की अधिक संभावना नही है. पदाधिकारियों पर तुरंत आरोप नही लगाना चाहिए, हो सकता है प्रशासन कार्रवाई की प्रकिया में हो और यह जानकारी स्थानीय मीडिया के संज्ञान में है. आप आश्वस्त रहिये अगर मामला रफा दफा हुआ तो पुनः कॉल कीजियेगा सारा मामला का डिटेल्स दीजियेगा. हम कॉल रिकॉर्ड करेंगे, आपके वॉइस पिच को बदल देंगे, उसको वीडियो फॉर्मेट में कन्वर्ट करेंगे और 50-60 व्हाट्सएप ग्रुप में भेज देंगे - गाड़ी थाने से निकली होगी तो अपने आप चलकर वापस आ जायेगी. वो बोला ठीक है.

शनिवार, 31 अगस्त 2019

बेनीपट्टी उपकारा का आज विधिवत उद्घाटन हो गया


बेनीपट्टी उपकारा का आज विधिवत उद्घाटन हो गया. समारोह में विधायक भावना झा - फैयाज अहमद का आमंत्रित होकर अनुपस्थित रहना और सांसद अशोक कुमार यादव - एमएलसी दिलीप कुमार चौधरी को आमंत्रित नहीं करना चर्चा का विषय रहा. इसके अलावे अच्छी बात रही कि बांकी नेताओं की गैरमौजूदगी में भी मंत्री विनोद नारायण झा ने जेल उद्घाटन का कोई क्रेडिट नहीं लिया, इसके अलावे उन्होंने इस बात का जिक्र जरूर किया कि उन्होंने हर सदन में जब भी मौका मिला बेनीपट्टी उपकारा के लिए आवाज उठाया - सवाल किए.

हालांकि जेल उद्घाटन का पूरा श्रेय बिहार के जेल आईजी मिथिलेश मिश्रा सर जो कि 6 साल पहले आज ही के दिन पहली पोस्टिंग पर बेनीपट्टी के एसडीएम बनकर आये थे उनको जाता है. वह आज उद्घाटन समारोह में आये भी थे - उनका संबोधन काफी बेहतर था. अपने संबोधन में मंत्री विनोद नारायण झा ने भी मिथिलेश मिश्रा की जमकर तारीफ़ की. स्वभाविक है बेनीपट्टी उपकारा शुरू होने का पूरा श्रेय बिहार के जेल आईजी मिथिलेश मिश्रा सर को जाता है इसमें कोई दो राय नहीं है.

लेकिन अब जब जेल का उद्घाटन हो गया है तो यहां के अपराधियों को इस जेल की लाज रखनी होगी - क्योंकि कोई आपके लिए कॉलेज खोल सकता है - स्ट्रीम चयन कर एडमिशन तो आपको ही लेना है ❤️

सोमवार, 12 अगस्त 2019

बेनीपट्टी सार्वजनिक शौचालय की घेराबंदी नही होगी


बेनीपट्टी सार्वजनिक शौचालय की घेराबंदी नही होगी. बता दें कि बेनीपट्टी थाने की घेराबंदी हो रही है. थाने के जमीन में सार्वजनिक शौचालय है जो कई दशक पूर्व से है. जिसका पुनर्निर्माण पिछले साल हुआ था. उक्त शौचालय के करीब तक थाने की घेरेबंदी की दीवाल पंहुची थी - जिसके बाद यह आशंका की जा रही थी कि शौचालय को भी घेराबंदी कर अंदर ले लिया जाएगा.

लेकिन इस पर त्वरित संज्ञान लेते हुए बेनीपट्टी डीएसपी Pushkar Kumar जी ने रविवार को निरीक्षण करते हुए इन आशंकाओं पर अंकुश लगा दिया है. उन्होंने यह भरोसा दिलाया है कि सार्वजनिक शौचालय पूर्व की भांति ही रहेगा - उसकी कोई घेराबंदी नहीं होगी और शौचालय का मुख्य गेट सड़क के तरफ पूर्व की तरह ही खुला रहेगा.

एसडीओ पुष्कर कुमार जी के निरीक्षण के समय मौके पर मौजूद रहे मिथिला स्टूडेंट यूनियन के Ashish Jha Chunnu ने यह जानकारी दी है. निरीक्षण के दौरान बेनीपट्टी थानाध्यक्ष, बेनीपट्टी पंचायत के पंचायत समिति सदस्य आनंद कुमार झा, बेनीपट्टी पंचायत के पैक्स अध्यक्ष योगीनाथ झा बबलू सहित कई स्थानीय लोग-व्यवसायी भी मौजूद थे.

इसमें ना किसी की जीत हुई है ना किसी की हार हुई है. जनता के हित में प्रशासन ने नैतिकता के साथ समय रहते पहल किया है - धन्यवाद बनता है.

फोटो - Murari

शनिवार, 10 अगस्त 2019

बहुत संघर्ष के बाद बेनीपट्टी को यह सार्वजनिक शौचालय नसीब हुआ है


बेनीपट्टी शौचालय 6 अक्टूबर - सुनते ही जेहन में वह भीड़ जरुर याद आती है जिसमें बेनीपट्टी थाने की जमीन कम लोगों का सिर अधिक दिख रहा था. जिस बंदी में बेनीपट्टी के तमाम दुकानें स्वतः बंद हुई थी. सड़कों पर हजारों लोग थे जो एक आन्दोलन-जिद्द और संघर्ष का परिणाम था. दर्जनों लोगों पर दर्जनों धाराओं में मुकदमा हुआ था. आज यह याद दिलाने का कारण यह है कि बेनीपट्टी में थाने के घेराबंदी चल रही है. घेरा बंदी की दीवाल बेनीपट्टी मुख्यालय के एकमात्र सार्वजनिक शौचालय तक पंहुची है जिसे बेनीपट्टी प्रशासन घेराबंदी करके थाने के अंदर लेने की कवायद कर रही है. अगर ऐसा हो जाता है तो यह शौचालय थाने के कब्जे में चला जायेगा - जिसका लाभ पुलिसकर्मियों और उनके परिवार वालों के अलावे किसी को नहीं मिलेगा. थाने के गेट से अंदर जाने पर पुलिसकर्मियों की गालियां मिलेगी. हो सकता है इस आशंका पर अभी प्रशासन से यह जवाब मिले कि कोई रोक नहीं होगा थाने के गेट से शौचालय के अंदर जाने के लिए. लेकिन जो अधिकारी यह वादा करेंगे वह चंद महीनों सालों में दुसरे जगह तबादला होकर चले जायेंगे और इसका खामियाजा यहां की जनता को भुगतना पड़ेगा. जबसे यह जानकारी मिली है मन में आक्रोश है - बहुत संघर्ष के बाद बेनीपट्टी को यह सार्वजनिक शौचालय नसीब हुआ है इसको अपने कब्जे में लेना इतना आसान नहीं होगा प्रशासन के लिए.

आप लोग राय दें क्या प्रशासन जो कर रही है वह सही है ?

सोमवार, 5 अगस्त 2019

आज इस तस्वीर की काफी अहमियत है - कश्मीर हमारा है


आज इस तस्वीर की काफी अहमियत है - जिस आदमकद प्रतिमा के सामने देश के प्रधान और देश के गृह मंत्री सिर झुका रहे हैं वह प्रतिमा जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की है.

जब हिंदू महासभा से विमुख होकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की, तो 1952 दिसम्बर में इसका पहला अधिवेशन कानपुर में हुआ. निशाने पर शुरू से ही कश्मीर था. नारा दिया गया- एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे. कानपुर अधिवेशन इसी संकल्प के साथ शुरू किया गया कि कश्मीर के पूर्ण एकीकरण को देशव्यापी मुद्दा बनाया जाए. उससे पहले अटलजी को साथ लेकर पूरे देश में श्यामा प्रसाद मुखर्जी दौरा भी कर चुके थे, ऐसे ही एक दौरे के दौरान दोनों से एल के आडवाणी कोटा स्टेशन पर मिले थे. उन दिनों आडवाणी कोटा में ही थे.

जम्मू कश्मीर सरकार ने एक नियम बना दिया था कि जो को भी जम्मू कश्मीर में भारत से आएगा, उसे वहां आने के लिए राज्य सरकार से परमिट लेना पड़ेगा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ये बात काफी नागवार गुजरी और उन्होंने बिना परमिट कश्मीर में जाने की योजना बनाई. डा. मुखर्जी कई साथियों के साथ, कश्मीर के लिए 8 मई 1953 को एक पैसेंजर ट्रेन से निकले, रेल से उन्होंने पहले पंजाब पार किया. पूरा पंजाब मुखर्जी को देखने के लिए उमड़ा जा रहा था. उनका अंतिम पड़ाव राव नदी के किनारे माधोपुर चैकपोस्ट थी. रावी नदी जम्मू कश्मीर और पंजाब के बीच सीमा रेखा के तौर पर थी.

रावी नदी पर जो पुल था, उसका बीच का स्थान दोनों राज्यों के बीच की सीमा मानी जाती थी. जब जीप मुखर्जी और उनके साथियों को लेकर पुल के बीचोंबीच पहुंची तो वहां जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी एक बड़े दस्ते के साथ खड़े हुए थे. उन्होंने मुखर्जी को मुख्य सचिव का एक लैटर दिखाया, जिसके मुताबिक मुखर्जी के लिए राज्य में प्रवेश की मनाही की बात लिखी थी. डा. मुखर्जी ने उस आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया और ऐलान किया कि वो कश्मीर जाने के लिए दृढ प्रतिज्ञ है, अपने देश के अंदर किसी भी स्थान पर जाने के लिए मुझे किसी भी इजाजत की जरुरत नहीं.

तत्काल पुलिस अधीक्षक ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत उनकी गिरफ्तारी का ऑर्डर निकाला. मुखर्जी को हिरासत मे ले लिया गया, उनके दो सहयोगी वैद्य गुरुदत्त और टेकचंद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. चूंकि अटल बिहारी बाजपेयी इस यात्रा पर बतौर पत्रकार साथ थे, इसलिए वो गिरफ्तारी से बच गए. लेकिन उनसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे कहा, ‘तुम वापस जाओ और देशवासियों को बताओ कि डा. मुखर्जी ने प्रतिबंध आदेशों की अवहेलना करते हुए जम्मू एंव कश्मीर में प्रवेश किया है और वह भी बगैर परमिट के, भले ही एक बंदी के रुप में क्यों ना हो’

डा. मुखर्जी को श्रीनगर से दूर निशात बाग के निकट एक छोटे से घर को अस्थाई जेल बनाकर नजरबंद कर दिया गया. 23 जून को देश को फिर उनकी मौत की ही जानकारी मिली कि कैसे उनको अचानक 10 मील दूर एक हॉस्पिटल मे भी ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच पाई. आज तक देश सच्चाई का सही पता नहीं लगा पाया है.

जबकि अटल मुखर्जी की बात मानकर उस वक्त वापस लौट गए थे, लेकिन उनको उन्होंने पंजाब में मुखर्जी का शानदार स्वागत देखा था. ऐसे में जब मुखर्जी की मौत की खबर आई तो उनको लगा कि उनको भी चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए. अटल बिहारी बाजपेयी ने एक इंटरव्यू में बताया कि तभी मैंने तय कर लिया कि डा. मुखर्जी के सपनों को, अधूरे कामों को पूरा करना है. जिसके बाद वह राजनीति में सक्रीय रूप से आये... बीजेपी देश में आई और आज अटल जी के शिष्य मोदी-शाह के नेतृत्व में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का अधूरा सपना पूरा हुआ है.

#KashmirHamaraHai

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

अभी सिलिंडर बांटने का मौसम है ग़ालिब... की हमें डिस्टर्ब ना करो


अभी सिलिंडर बांटने का मौसम है ग़ालिब... की हमें डिस्टर्ब ना करो

मैथिली को अष्टम अनुसूची में स्थान मिलने के बाद अक्सर इसका क्रेडिट-डेबिट लेने वाले सिलिंडर डिस्ट्रीब्यूटर भाजपाई ना जाने किस बिल में घुसे पड़े हैं। सिलिंडर बांटने के मौसम में अखबार के किसी कोने में आने की चाहत ने सभी को देशी झबड़ा बना दिया है। मिथिला मैथिली के मंच पर पाग-डोपटा धारण कर पान माछ मखान, मंडन अयाची गान, कालिदास विद्यापति लोरिक सल्हेश दुलरा दयाल का नाम लेकर भौकाली टाइट करने वाले सभी सतरंगी मोदी भक्त लोकसभा का टिकट फाइनल करने में लगे हुए हैं। लेकिन उन झबड़ों को कौन याद दिलाएगा की जिस मिथिला का तुम नाम बेचकर राजनीति करते हो, जिस श्री राम का नाम लेकर तुम भागलपुर, सीतामढ़ी में रामनवमी जैसे माहौल में तलवार से कीर्तन करते हो उसी श्री राम की अर्धांग्नी सीता की धरती मां मिथिला के पुत्र हो तुम। 

और उसी मिथिला की भाषा मैथिली के साथ खिलवाड़ हो रहा है। तुम्हारी भाषा को बोली कहकर अपमानित किया जा रहा है और तुम सिलिंडर बांटने के बहाने सरेंडर कर चुके हो।  

खैर तुम्हारी मजबूरियों को भी हम समझते हैं। अखबार के विरुद्ध इस आंदोलन में आना तुम्हारे लिए क्या तुम्हारे अड़ोसी-पड़ोसी के लिए भी आसान नहीं है। क्योंकि जिस मंदिर के तुम पुजारी हो और जिस प्रसाद के लिए तुम पिछले 4 साल से जय श्री राम.. जय श्री राम का नारा लगा रहे हो उसका प्रसाद वितरण का समय नजदीक आ चुका है। अगर कल तुम्हे प्रसाद मिल जाता है और प्रसाद प्राप्त करने की खबरें अगर अखबार में नहीं छपती है तो तुम प्राण भी त्याग सकते हो। खैर तुम ही नहीं तुम्हारा अड़ोसी-पड़ोसी और पहरेदार भी छपास रोग से ग्रसित हैं। कुछ नहीं कर सकते हो अगर तो कम से कम शर्म कर लो...  

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

‘तुम कितने बिभूति लाओगे, हर घर से बिरेंदर निकलेगा'











बिहार के स्थापित हो चुके हिंदी भाषी अखबार दैनिक जागरण ने अपने हिंदी भाषा कार्यक्रम में मैथिली को बोली के रूप में शामिल किया। कार्यक्रम के लिए मैथिली के प्रतिनिधि वक्ता के रूप में बिभूति आनंद भैया थे, जिन्होनें उस कार्यक्रम का हिस्सा बनने से यह कहते हुए इनकार कर दिया की मैथिली बोली नहीं भाषा है। बढ़ते फेसबुक पोस्ट से अख़बार को मैथिली को हिंदी की बोली कह कर शामिल किये जाने पर विरोधाभास का भान हुआ तो अगले दिन उक्त सत्र के लिए बोली के रूप में शामिल मैथिली को हटा लिया गया। लेकिन आज फिर आमंत्रण पत्र में अखबार ने मैथिली को बोली की श्रेणी में दिखाया है... इस बार वक्ता के रूप में पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग के हेड प्रोफेसर वीरेंद्र झा हैं
















विजयदेव झा भैया लिखते हैं की... सन 2003 में जब मैथिली के संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल करवाने का अभियान चल रहा था। भारत सरकार को सौंपे जाने वाले मेमोरेंडम लिखने और दस्तावेज जुटाने की तैयारी चल रही थी। 

मेमोरेंडम में मैथिली का इतिहास बताना था जिसमे पटना विश्वविद्यालय में मैथिली का शामिल होना एक अहम बिंदु था। पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग में पटना विश्वविद्यालय के उस सीनेट की बैठक और संबंधित दस्तावेजों की कॉपी थी जिसके आधार पर मैथिली की पढ़ाई शुरू हुई थी।




विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू को इन दस्तावेजों को प्राप्त करने के लिए श्री वीरेंद्र झा साहब के पास भेजा गया। किसी मैथिली प्रेमी और शिक्षक के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि उसकी भाषा संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल हो रही है।

लेकिन प्रोफेसर वीरेंद्र झा एकाएक भड़क गए उन्होंने बैद्यनाथ चौधरी को डांटते हुए कहा कि आप फालतू के अभियान में मुझे घसीट रहे हैं मैं प्रोफेसर हूं मुझे आंदोलन से क्या लेना देना। आपकी हिम्मत कैसे हुई कि आप मेरे पास दस्तावेज लेने के लिए आ गए।














उपरोक्त वाकये को पढ़ने के बाद भी अगर कोई प्रोफ़ेसर बीरेंद्र झा से मैथिली के सम्मान के लिए कुछ अपेक्षा रखते हैं तो शायद आप बकलोल हैं। और अगर धोखे से कल तक वह मैथिलों के अपेक्षा पर खड़े हो जाते हैं तो वह बकलोल हैं

फिलहाल मिथिला राज्य निर्माण कार्य को पोसपोंड कीजिये और बम्पर ऑफर का फायदा उठाइये... मैथली को बोली कहे जाने को लेकर सोशल साइट्स पर ट्रोल हो रहे प्रोफेसर बीरेंद्र झा जहां मिले मुंह पर खुद गमछा ओढीये और उनको भी मुंह पर गमछा ओढा के फुला दीजिये। 

उपरोक्त शब्द का संकलन अच्छा लगा तो लिख दिए हैं। खैर ऐसा कुछ होने वाला नहीं है... हो जाए तो कोई बुरा भी नहीं है। क्योंकि खट्टर कक्का कहते हैं की चच्चा के सामने बच्चा सबका एक-आध गलती क्षम्य होता है। 

नहीं तो उनका बेटा पोता कहता हुआ मिलेगा...
 ‘तुम कितने बिभूति लाओगे, हर घर से बिरेंदर निकलेगा'


मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

गुजरात दंगे के पोस्टर बॉय कैसे बनें राजनितिक 'मोहरे'



रामनवमी के बाद बिहार के कई जिले हिंसा के चपेट में आये। दो समुदाय आपस में हिंसक होकर सड़कों पर तांडव मचा रहे थे वहीं सदन में बैठे नेता दो खेमों में बंटकर बिहार में धार्मिंक हिंसा के नाम पर सुलग रही आग में पानी व घी दोनों देने का काम कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते अचानक हालत बदल जाते हैं। एससी/एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संसोधन की पहल के विरोध सड़कों पर आई भीड़ हिंसक हो जाती है। पलक झपकते प्राइम टाइम डिबेट चलने लगता है। राजनीती के मायने व नेताओं के बयान बदल जाते हैं। अख़बारों की सुर्खियां पिछले दिनों की ही तरह रहती है। न्यूज़ का हेडलाइन में थोड़ा-बहुत बदलाव होता है, दो समुदाय के जगह जातियों में बंटे दो समूह का संघर्ष झड़प लीड खबर बनती है।

नेतृत्वविहीन भीड़ का हिस्सा युवा हाथ में तलवार, भाला, डंडा आदी लेकर रंग-बिरंगे पट्टी को सर में बांध कर मीडिया के कैमरे में आने के लिए उताहुल नजर आता है। लॉ एंड आर्डर को भंग करने के नाम पर गोलीबारी होती है, लोग मरते हैं। जमकर लाठीचार्ज होता है, लोग घायल होते हैं। सैकड़ों एफआईआर होती है, हजारों गिरफ्तारी होती है। नेताओं के फिर से बयान छपते हैं। विपक्ष सरकार पर हमला करती है, सरकार से इस्तीफा मांगा जाता है। सरकारें गिर जाती है, नई सरकारें बन जाती है। लेकिन इन सब से फायदा किसका और नुकसान किसका यह बात वर्तमान परिदृश्य में सोचने व समझने की आवश्यकता है। नहीं तो हालात कुछ ऐसे हैं की अगले पोस्टर बॉय अशोक मोची और कुतुबुद्दीन अंसारी आप और हम देखते ही देखते कब बना दिए जायेंगे यह कोई नहीं बता सकता है।




दंगा... शब्द सुनते ही ‘गोधरा’ याद आता है। देश के सबसे बड़े दंगो में शुमार गुजरात के गोधरा में साल 2002 में हुई घटना इतिहास के पन्नों में सिमटी हुई है, लेकिन अक्सर वह वर्तमान को कुरेदती रही है। उपद्रवियों की उपद्रव ने किस तरह गुजरात को हिंसा के आग में धकेल दिया यह देश ने देखा। डेढ़ दशक से अधिक बीत चुके इस घटना को याद करके भी एकबारगी लोग सहम जाते है। किस तरह सड़क पर उतरी नेतृत्व विहीन भीड़ ने कत्लेआम मचाया हजारों जाने गई। हजारों घर, दुकानें, मंदिर, मस्जिद आग के हवाले करे दिए गये। जिसका जवाब ना तो आज शीर्ष में बैठे मठाधीशों के पास हैं ना ही उन चेहरों के पास जो राजनीति के मोहरे बन गये। गौरतलब है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक कोच में उपद्रवियों ने आग लगा दी थी, जिसमें अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों सहित 59 यात्री मारे गए थे। इस घटना के बाद दंगे भड़क उठे थे।















उस भीड़ में कुछ ऐसे भी चेहरे थे जो गुजरात दंगे का प्रतीक बन गये। वह नाम था अशोक परमार उर्फ अशोक मोची और कुतुबुद्दीन अंसारी का। आंखों में गुस्सा, सर पर भगवा पट्टी, हाथ में लोहे की छड़ और बैकग्राउंड में धधकती आग के साथ गरजता हुआ अशोक मोची की तस्वीर शायद की किसी अखबार के सुर्ख़ियों में ना रहा हो। दंगा, हिंसा जैसी घटनाओं में आज भी मोहरा बनाये जाने वाले लोगों के लिए यह तस्वीर ऊर्जा के संचार करने काम करती है।

वहीं आंखों में आंसू भरे,  और हाथ जोड़कर दया की गुहार लगाते तस्वीर जिसनें भी देखा दिल पसीज गया। वह तस्वीर कुतुबुद्दीन अंसारी का था। लेकिन अशोक मोची और न्याय की गुहार लगाते कुतुबुद्दीन अंसारी की तस्वीर जिस तरह से गुजरात दंगो के समय मीडिया की फ्रंट लीड बनी उस तरह से दंगे के बाद उन दो चेहरों व तस्वीरों की सच्चाई अख़बारों के किसी पन्ने पर जगह नहीं मिल सकी।


दरअसल, साल 2002 के गुजरात दंगों में सिर पर भगवा कपड़ा बांध और हाथ में रोड लिए हिंसा का चेहरा बने अशोक मोची और असहाय हालात में हाथ जोड़कर बेबस और लाचारी का चेहरा बने कुतुबुद्दीन अंसारी की वायरल हुई तस्वीर की सच्चाई कुछ और ही है। असल में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सामने आया कि न तो अशोक आरोपी है और न ही अंसारी पीड़ित। इस के पीछे की सच्चाई अशोक ने खुद लोगों से शेयर की और कहा की मेरा इस उस हिंसा से लेना-देना नहीं है।

42 वर्षीय अशोक ने दंगे के बाद सच्चाई सामने लाते हुए कहा की, ‘मैंने गलत जगह गलत एक्सप्रेशन दे दिए। मुझे एक पत्रकार द्वारा उस तरह से पोज देने को कहा गया था। मुझे यह अनुमान नहीं था की मैं इस तस्वीर से राजनीति का मोहरा बन जाउंगा। जबकि वहां हो रही हिंसा से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। मुझसे उस तरह से पोज देने को कहा गया था और इस तस्वीर ने इन दंगों में आरोपी न होते हुए भी मुझे दंगों का चेहरा बना दिया।














अशोक ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि कैसे हिंदूवादी समूहों के लोग आ-आकर लोगों को भड़काते थे। ट्रेन में जले लोगों की फोटो दिखाते थे। फिर ये भी कहा कि मुस्लिमों और दलित समाज की एक ही स्थिति है। गुजरात में सरकारी नौकरी को कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर कर दिया गया. अब दलितों के लिए कुछ नहीं बचा। दंगों के वक़्त हमसे गलती हुयी थी, कुछ समझ नहीं पाए।

असहाय हालात में हाथ जोड़कर बेबस और लाचारी का चेहरा बने कुतुबुद्दीन अंसारी बताते है मेरी यह तस्वीर तब खींची गई जब मैं वह रैपिड ऐक्शन फोर्स के जवानों से रखियल एरिया में अपने परिवार को बचाने की अपील कर रहा था। हालाँकि मेरा मेरा परिवार तो बच गया लेकिन मुझे दंगा पीड़ित मुसलामानों का चेहरा बना दिया गया। कुतुबुद्दीन अंसारी को ये पहचान आज से दस साल पहले औरको दत्ता ने दी थी। उसके बाद से कुतुबुद्दीन अंसारी की ज़िदगी बदल गई। अंसारी की तस्वीर का बाद में कई जगह दुरुपयोग भी हुआ अहमदाबाद में 2008 के सीरियल ब्लास्ट के बाद आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने इसका गलत तरीके से उपयोग हुआ था।




उस दौरान अंसारी गुजरात छोड़ पश्चिम बंगाल की सरकार द्वारा दिए गए निमंत्रण के तहत कोलकाता चले गए थे लेकिन 2005 में वह परिवार समेत अहमदाबाद वापस लौट आए गुजरात वापसी के बाद अंसारी ने दंगे में अपनी प्रॉपर्टी के नुकसान के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाए लेकिन किराए के मकान में रहने की वजह से सरकार के पास नुकसान हुई संपत्ति का कोई रेकॉर्ड नहीं था। जिसके कारण उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिल सका। कुतुबुद्दीन अंसारी अब छोटी सी अपनी टेलर की दुकान चलाते हैं।

फोटो पत्रकार औरको दत्ता  बताते ही की हाथ बांधे, रूंधी आंखे, बदहवास कुदुबुद्दीन अगर गुजरात दंगो की पहचान न बनते तो शायद लोगों के खौफ की खबर मिलते मिलते बहुत देर हो गई होती।  फोटो पत्रकार औरको दत्ता  से 10 साल बाद मिले मुझे कुतुबुद्दीन अंसारी ने सारी शिकवे शिकायतें दूर करते हुए कहा था की उनसे मिलकर भरोसा हो गया है कि उन्होंने मुझे तकलीफ पहुंचाने के लिए तस्वीर नहीं ली थी। ये तो उनका काम था, मेरे सवालों का जवाब मिल गया है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है।















असम और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार के पोस्टर में अंसारी की उसी तस्वीर का प्रयोग किया है। तस्वीर का कैप्शन है, 'क्या मोदी के गुजरात का मतलब सिर्फ विकास है? क्या आप असम को गुजरात बनाना चाहते हैं। फैसला आपके हाथ में है।' 2002 गुजरात दंगों के वक्त अंसारी की उम्र 29 साल थी और आंखों में आंसू भरे, दया की गुहार लगाते उनकी तस्वीर दंगों की बेंचमार्क फोटो की तरह प्रयोग की गई।


अशोक ने एक अंग्रेजी अखबार को बताया, 'खराब आर्थिक स्थिति की वजह से ही मेरी शादी नहीं हो पाई' अशोक अब हलीम नी खड़की में सड़क पर रहते हैं। दंगे के बाद उनके खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए। उन्होंने बताया, 'निचली अदालत ने मुझे बरी कर दिया क्योंकि वे स्थानीय मुसलमानों से मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं ला सके। लेकिन पर किस्मत और राजनीति पलटी मारी किस्मत ने साथ नही दिया और सरकार ने मुझे बरी किए जाने के खिलाफ अपील की और अभी फैसला आना बाकी है।





अशोक मोची आज भी मोची का ही काम करते हैं। क़ुतुबुद्दीन भी अब शांत जीवन गुजार रहे हैं। वक़्त बीता, कुछ जख्म भी भरे। जिसके बाद 2014 में दोनों साथ ही एक मंच पर आये। गुलाब का फूल लिया-दिया।

रविवार, 4 जून 2017

चर्चित नैंसी हत्याकांड का 'अर्धसत्य' जिससे हत्याकांड ले सकता है नया मोड़

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मधुबनी : बिहार के मधुबनी जिले में हुए नैंसी हत्याकांड सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने के बाद अब प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक्स व वेब मीडिया की सुर्खियाँ बनी हुई है. मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव, फुलपरास विधायक लक्ष्मेश्वर राय, स्वामी अग्निवेश, बीजेपी नेता सुशील मोदी, विधान पार्षद विनोद नारायण झा, झंझारपुर के सांसद बीरेंद्र चौधरी सहित कई बड़े नेता नैंसी के गांव पंहुच कर नैंसी को न्याय दिलाने की बात कर रहे है. इसको लेकर बीते शुक्रवार को बीजेपी ने अंधरामठ में धरना भी दिया था. वहीं #Justice4nancy कैम्पेन चला रही मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने कुछ दिन पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर कैंडल मार्च निकाल विरोध-प्रदर्शन किया था. मिथिला स्टूडेंट यूनियन सहित कई सामाजिक, छात्र संगठनों व आम लोगों के द्वारा अररिया, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा सहित कई जिलों में जगह-जगह कैंडल मार्च निकाला जा रहा है. 


जानकारी हो की मधुबनी जिले के फुलपरास अनुमंडल अंतर्गत अंधरामठ थाना अंतर्गत महादेवमठ गांव के शिक्षक रविन्द्र नारायण झा की लगभग 12 वर्षीय पुत्री नैंसी झा के अपहरण का प्राथमिकी 25 मई को अंधरामठ थाना में दर्ज कराया गया था. जिसके बाद 27 मई को नैंसी की लाश घर से लगभग 1 किलोमीटर दुरी पर तिलयुगा नदी के समीप बरामद हुआ था. जिस पर नैंसी के परिजनों ने प्रशासन पर यह आरोप लगाया था की पुलिस सही से काम नहीं कर रही है और अपराधियों को संरक्षण दे रही है. शक व प्रत्यक्ष गवाह के आधार पर पकड़े गये अपराधियों को पुलिस ने छोड़ दिया है. और पूछताछ के नाम पर नैंसी के दो चचेरे चाचा राघवेंद्र झा व पंकज के साथ पुलिस ने ज्यादती कर परेशान कर रही है.
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उधर नैंसी की हत्या के बाद की वीभत्स तस्वीर देखते ही देखते सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. सोशल मीडिया पर मिथिला स्टूडेंट यूनियन के द्वारा राष्ट्रीय सोशल मीडिया प्रभारी आदित्य झा के नेतृत्व में #Justice4nancy के जबरदस्त कैम्पेनिंग ने सभी का ध्यान अपने तरफ खींचा. सोशल साइट्स पर नैंसी की हत्या की बाद की वीभत्स तस्वीरें के साथ दुष्कर्म व एसिड अटैक, गाला रेतने, नस काटने व हत्या की बाते समय बीतने के साथ-साथ आग के तरह सोशल साइट्स पर फ़ैल रही थी. सोशल साइट्स कैम्पेन के बाद लोगों में बढ़ते आक्रोश को देखते हुए शाषण-प्रशासन सकते में आई और परिजनों के शक व गवाह के आधार पर घटना के दो दिन बाद गांव के लालू झा व पवन झा को पुलिस ने हत्यारोपी बनाकर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद प्रशासन ने प्रेस कांफ्रेंस में बताया की पोस्टमार्टम में दुष्कर्म, नस काटने, गला रेतने या एसिड अटैक की कोई बात नहीं है. बल्कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार लगभग 72 घंटे पहले नैंसी की हत्या हुई है. जो की गला दबाकर किया गया है. हालाँकि नैंसी की परिजनों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट यह कहकर मानने से इंकार कर दिया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में छेड़छाड़ हुई है जबकि नैंसी का नस काटा गया है और एसिड अटैक हुआ है फिर भी इसका उल्लेख पोस्टमार्टम में नहीं है.
इसके परे आपको बता दें कि पोस्टमार्टम 3 डॉक्टरों की बोर्ड ने किया है जिसमें दो महिलांए है. ओर इस बात से इंकार नही किया जा सकता है पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अब नए सिरे से कोई नया चीज़ देखने को नही मिलेगा. अगर परिजन दुबारा पोस्टमार्टम करवाना चाहती है तो उन्हें कोर्ट का सहारा लेना होगा.
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उधर जिले सहित पूरे बिहार व बिहार के बाहर दिल्ली तक बढ़ता आक्रोश और नैंसी के माता-पिता के पोस्टमार्टम पर बयान के बाद प्रशासन पर बढ़ता दवाब देख आनन-फानन में हत्याकांड की जांच में लापरवाही बरतने के आरोप में अंधरामठ थाने के एसआई राजीव कुमार को दो दिन पूर्व निलंबित कर दिया गया. राजीव कुमार के जगह कलुआही थाना प्रभारी आशुतोष कुमार झा को कमान दिया गया है. साथ ही जांच के लिए एसआईटी भी गठित कर दी गई है. जिसका नेतृत्व झंझारपुर एएसपी निधि रानी कर रही है. गठित एसआईटी में एएसपी निधि रानी सहित, मधुबनी महिला थाना प्रभारी कंचन कुमारी, टेक्नीकल टीम के सदस्य व बांकी योग्य पदाधिकारियों को रखा गया है.

वहीं नैंसी के परिजन द्वारा दर्ज एफआईआर और मीडिया के समक्ष दिए गये बयान में लालू झा व पवन झा के हत्यारोपी होने के शक का आधार यह बताया गया है की, 5 साल पहले नैंसी की बुआ रानी (काल्पनिक नाम) के साथ छेड़खानी को लेकर झगड़ा हुआ था. और प्राथमिकी के आधार पर 25 मई को नैंसी का अपहरण हुआ और उसके अगले दिन 26 मई को नैंसी की बुआ रानी का शादी होना था. जिसे रोकने की लिए लालू झा व पवन झा ने सजिश के तहत नैंसी का अपहरण किया.


दर्ज प्राथमिकी/परिजनों का बयान/प्रशासन का बयान/मीडिया व सोशल मीडिया में आई हुई बातें से विश्लेष्णात्मक तथ्य जो सोचने पर मजबूर करेंगे :

1. मिली जानकारी के अनुसार जिस दिन 25 मई को नैंसी का अपहरण हुआ था, उस दिन नैंसी अपनी बुआ रानी को 26 मई को होने वाली शादी के लिए मेहँदी की रश्म अदायगी में गई थी. और नैंसी व रानी के परिवार के अधिकांश लोग उस दिन गांव में नहीं थे. नैंसी के पिता सहित अधिकांश पुरुष परिजन शादी की परंपरा के अनुसार खान-पिन के लिए निर्मली गये थे.

2. दर्ज प्राथमिकी में यह भी कहा गया है की नैंसी शाम 06:30 बजे शाम में गायब हुई है. और नैंसी की खोज-पड़ताल खान-पिन में गये परिजनों के लौटने के बाद लगभग 9 बजे से शुरू हुई. यहाँ सवाल यह है की जो परिजन खान-पिन में गये थे. उनके अलावे बांकी जो महिला व पुरुष घर पर बच गये थे उन लोगों (नैंसी के अपने घर व रानी के घर के लोग) ने नैंसी के शाम में गायब होने के बाद लगभग ढ़ाई घंटो तक नैंसी की खोज क्यों नहीं की ?? अगर खोज-पड़ताल की भी गई तो प्राथमिकी में क्यों लिखा गया है की खान-पिन में गये परिजनों के लौटने के बाद खोज-पड़ताल शुरू हुई. अगर 06:30 बजे गवाहों ने लालू झा व पवन झा को उस रास्ते से गुजरते हुए देखा तभी उस पर शक क्यों नही किया गया ?? अगर लालू झा व पवन झा पर शक था तो जब परिजनों ने लालू व पवन को घर से पकड़ा तभी आरोपी के घर मे परिजनों द्वारा समय रहते नैंसी को क्यों नही खोजा गया ??
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3. निर्मली से खान-पिन कर लौटने के बाद परिवार के बांकी सदस्य जब महादेवमठ पंहुचे और 06:30 बजे गायब हुई नैंसी को ढूंढने के लिए 09:00 बजे करीब में सभी परिजनों की आपसी चर्चा हुई तो नैंसी के पड़ोस के चाचा जो की इस केस के मुख्य गवाह है उन्होंने बताया की उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक के पास से शाम में 06:30 बजे किसी अज्ञात मोटरसाईकिल वाले ने नैंसी को जबरदस्ती बाइक पर बिठाकर अपहरण कर लिया. वहीं दर्ज एफआईआर में यह भी बताया गया है की उस अज्ञात (एक) व्यक्ति को बाइक पर नैंसी को जबरदस्ती बिठाकर ले जाते हुए ग्रामीणों ने भी देखा. लेकिन नैंसी को जबरदस्ती बाइक पर बिठाकर ले जाते हुए देखने वाले कौन ग्रामीण लोग थे, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है. और ना ही मीडिया व पुलिस को इसकी जानकारी है.



इसके बाद गवाह ने यह भी बताया की जिस रास्ते से नैंसी को अज्ञात (एक) बाइक सवार ने अपहरण करके जबरदस्ती ले गया, उसी रास्ते से कुछ देर बाद लालू झा व पवन झा को आते हुए देखा गया. दर्ज प्राथमिकी में एक महिला के बयान के आधार पर बताया गया है की उस महिला ने अज्ञात मोटरसाईकिल सवार व्यक्ति का हुलिया हल्का दाढ़ी, श्यामल रंग का उजला आसमानी चेकदार फुल शर्ट, काला पेंट व सिर पर उजला गमछा का पगड़ी बांधे हुए थे. नैंसी के चाचा के प्रत्यक्ष गवाह व महिला के द्वारा बताये गये हुलिए के बाद तर्क यह भी दिया गया की 5 साल पहले लालू झा व पवन झा के परिवार से रानी के परिजन से मारपीट हुई थी. जिसके बाद अपहरण की साजिश रचने की शक की सुई पड़ोसी लालू झा व पवन झा पर गई.
लेकिन यहां सोचने वाली बात यह भी है की किसी 12 साल की किसी लड़की या लड़का को एक व्यक्ति वह भी बाइक सवार कैसे अपहरण कर सकता है ?? क्या नैंसी ने कोई प्रतिकार नहीं किया होगा ?? अगर वह व्यक्ति (एक) बाइक सवार व्यक्ति ने शाम 06:30 बजे नैंसी का अपहरण बाइक पर किया तो रास्ते में कई लोगों का घर पड़ता है. क्या किसी ने नहीं देखा होगा ?? अगर बाइक सवार व्यक्ति ने नैंसी का अपहरण किया तो नैंसी को कहीं दूर ले गया होगा, लेकिन लाश 1 किलोमीटर के दायरे में ही क्यों मिला ??

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जिस महिला के बयान को अपहरण करने वाले का हुलिया बताया गया है वह महिला कौन है यह जानकारी ना तो मीडिया को पता है ना ही एसआईटी टीम को या किसी पुलिस अधिकारी को. परिजनों के ताजा बयान के अनुसार उक्त महिला सामाजिक व अपराधियों के दवाब के कारण अब मीडिया व पुलिस के सामने आने से बच रही है.

4. नैंसी के परिजन के अनुसार शक की सुई लालू झा व पवन झा पर जाने के बाद परिजनों ने लालू झा व पवन झा को उसके घर से पकड़कर पुलिस को सौंप दिया. साथ ही परिजनों ने मीडिया को यह भी बताया है की दोनों आरोपी उस वक्त नशे में था जिसकी जानकारी पुलिस को दी गई थी और घर के पास शराब की बोतल भी देखी गई थी. परिजनों ने यह भी बताया की लालू झा व पवन झा को पुलिस पदाधिकारियों ने थाने ले जाकर मामूली पूछताछ कर छोड़ दिया.
(नोट : शराब की बोतल मिलने व आरोपी के नशे में होने की पुष्टि पुलिस ने नहीं की है)

5. नैंसी 25 मई को अपने बुआ रानी की अगले दिन 26 मई को होने वाली शादी के लिए मेहंदी लगाने के लिए 3 लड़कियों के साथ रानी के घर गई. जिसमें नैंसी के अलावे बांकी लड़की वहां से लौट गई. लेकिन किसी करणवश नैंसी बांकी 3 लड़की के साथ नहीं लौटी. और अंतिम बार वहां जाने के बाद गायब हो गई.

6. परिजनों के बयान के अनुसार नैंसी के चाचा जो नैंसी हत्याकांड के मुख्य गवाह हैं, उनके साथ पुलिस ने नैंसी का लाश बरामद होने के बाद गवाही को लेकर पूछताछ के क्रम में ज्यादती करते हुए मार-पिट किया. साथ ही पुलिस उन पर नैंसी की अपहरण व हत्या करने का जबरदस्ती बयान देने के लिए मजबूर कर रही थी. जिसके बाद परिजनों के विरोध करने व इस मुद्दे पर न्याय की मांग कर रही सामाजिक संगठनों के दवाब पर पुलिस ने चाचा को छोड़ा.

7. परिजनों ने यह भी बताया है की कुछ ग्रामीणों ने परिजनों को यह बताया की अनुसंधान के क्रम में स्वान-दश्ता ने घटना स्थल से डाईगर और कुछ कपड़े सहित कई सामान बरामद किया है. जिसकी जानकारी ग्रामीणों ने परिजनों को दी थी. परिजन के अनुसार स्वान-दश्ता के आने के समय सभी परिजन नैंसी के दाह-संस्कार में व्यस्त थे. परिजनों ने बताया की डाईगर व अन्य सामान की बरामदगी जानकारी का आधार ग्रामीणों के द्वारा दिया गया है.
(नोट : डाईगर या अन्य सामान बरामद करने के समय नैंसी के कोई परिजन इसके प्रत्यक्ष गवाह नहीं है, ना ही कोई ग्रामीण व्यक्तिगत बयान दिया है)

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इस सब से हट कर परिजनों के बयान की माने तो परिजनों ने बयान के अनुसार नैंसी की हत्या का मुख्य कारण नैंसी की बुआ रानी की शादी को रोकने की मंशा बताया है. उपरोक्त बातों से इस बात की आशंका की पुष्टि होती है की हत्यारोपी नैंसी का अपहरण करने डाईगर व हथियार के साथ आये थे. अगर हथियार युक्त अपराधी घर से समीप से नैंसी का अपहरण रानी की शादी रोकने के लिए कर सकते हैं. तो यहां सोचने की बात यह है की नैंसी जिस घर में अंतिम बार गई थी, जहाँ से उसका अपहरण हुआ है वहां उस घर में नैंसी के अलावे रानी सहित 2 महिला व एक पुरुष थे. अपराधी अगर हथियार युक्त थे तो रानी या रानी की अपनी माँ, रानी के अपने भाई या घर में मौजूद अन्य सदस्य पर हमला, अपहरण या हत्या भी कर सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और अपराधियों ने रानी की शादी रोकने के लिए नैंसी का अपहरण किया.

8. लोगों का कहना है की नैंसी का अपहरण के एक दिन बाद भी रानी की शादी तय कार्यक्रम के अनुसार 26 मई को शादी संपन्न हो गई. जिससे बाद अपनी योजना सफल होते नहीं देख रानी की शादी से परेशान व पहचान उजागर हो जाने के डर से लालू झा व पवन झा ने नैंसी की हत्या कर दी. यहां सोचने वाली बात यह है की 25 मई की शाम को नैंसी का अपहरण हुआ और 26 मई को रात में रानी की शादी हुई. इसका मतलब है की अगर अपराधी रानी की शादी रोकने के उद्देश्य से नैंसी का अपहरण किया गया था तो निश्चित है की अपराधी 26 मई की रात तक का यानी कम से कम 24 घंटे का इंतजार किया होगा, जब तक की रानी की शादी संपन्न हो जाने की जानकारी अपराधियों को नहीं मिली होगी. हम मान लेते हैं की नैंसी का अपहरण करने के बाद भी रानी की शादी नहीं रुकने से अपराधियों ने 26 मई को रानी की शादी संपन्न होने के बाद अपनी योजना सफल नहीं होते देख आक्रोश में नैंसी की हत्या कर दी और शव को नदी में फ़ेंक दिया.

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लेकिन यहां सोचने वाली बात यह भी है की लालू झा व पवन झा हत्यारा है तो वह तीसरा युवक जिसने अकेले बाइक से नैंसी का अपहरण किया वह कहाँ है ?? अगर लालू झा, पवन झा व उस अज्ञात बाइक सवार ने नैंसी की हत्या 26 तारीख को रानी की शादी संपन्न होने की जानकारी आने के बाद ही की होगी तो रानी की शादी किसी अन्य गांव/शहर में संपन्न हुआ था. तो शादी संपन्न होने की जानकारी लालू झा, पवन झा व उस अज्ञात बाइक सवार को फ़ोन कॉल्स/व्हाट्स एप्प/सोशल साइट्स के मध्यम से ही आई होगी.

अगर यह बात सत्य होगी तो पुलिस हत्यारोपी के फ़ोन कॉल्स/व्हाट्स एप्प/सोशल साइट्स भी खंगाले तो मदद मिल सकती है. लेकिन सोचने वाली बात यह भी है की 25 तारीख नैंसी के अपहरण के दिन से ही लालू झा व पवन झा पर पुलिस, परिजन व ग्रामीणों की नजर थी. और ऐसी विषम परिस्थिति में 26 मई को रानी की शादी संपन्न हो जाने की जानकारी मिलने के बाद मामूली दुरी पर लालू झा व पवन झा द्वारा नैंसी की हत्या कर लाश को नदी में फेंकना इतना आसान नहीं रहा होगा. तो इस बात से हम और आप संतुष्ट होते है तो सोचने वाली बात यह भी है की पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सत्य मानें तो जिस तरह से लगभग 72 घंटे पहले हत्या की बात पोस्टमार्टम में कही गई है उसके मुताबिक 25 मई को ही नैंसी की हत्या कर दी गई है.

इस बाबत मधुबनी के एसपी दीपक बरनवाल ने डेली बिहार न्यूज़ से यह भी बताया की प्रथम दृष्टया पहले अटैक में ही हत्या कर दी गई है. अपहरण के बाद हत्या जैसी संभावना नहीं लग रहा है. इस साफ शब्दों में समझें तो नैंसी का अपहरण हुआ ही नहीं है, बल्कि हत्या हुई है. अगर 27 तारीख को बरामद हुई नैंसी का शव क्षत-विक्षत व काला है तो आपको मानना पड़ेगा की कम से कम 2 दिन पहले हत्या हुई है. क्योंकि घंटे भर में लाश व नशों का फूलना व पूरा शरीर काला होना संभव नहीं है.

साथ ही अगर यह माना जाय की नैंसी का चेहेरे जो काला होना पानी में लाश रहने के कारण नहीं हुआ है तो पहला विकल्प एसिड का प्रयोग या दूसरा विकल्प पेट्रोल या मिट्टी तेल छिड़कर आग लगाने का प्रयास है. अब अगर हम पहले विकल्प अपराधियों द्वारा नैंशी की लाश का पहचान छुपाने की मंशा से एसिड से चेहरा जलाने की प्रयास की बात पर यकीन करें तो हमें यह भी पहले सोचना पड़ेगा की चेहरे पर एसिड डालने के बाद चेहरा जल जाता है, पिघल जाता है या काला हो जाता है ?

दूसरा विकल्प पेट्रोल या मिट्टी तेल छिड़कर आग लगाने की बात पर यकीन करें तो सबसे पहले यह सोचना होगा की पेट्रोल या मिट्टी तेल छिड़कर आग लगाने से चेहरा जले ना जले पहले बाल जरुर जलेगा. जो की बिना जले हुए बाल आप नैंसी की हत्या के बाद की तस्वीर में देख सकते है.
उपरोक्त उलझी हुई बातों से शायद कई उलझे हुए प्रश्न आपके जेहन में आये होंगे लेकिन कई प्रश्न के साथ एक तथ्यात्मक प्रश्न यह भी है की नैंसी की हत्या का कारण 26 मई को होने वाली जिस रानी नाम की लड़की की शादी को बताया जा रहा है.

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वह नैंसी की अपनी बुआ नहीं थी, बल्कि रानी नैंसी के पापा की चचेरी बहन थी. और ना ही नैंसी और रानी का घर एक अंगने में है, ना ही संयुक्त परिवार है. बल्कि दोनों की घरों की अच्छी-खासी दुरी भी है. जिसकी दूरी 300 मीटर है. अगर अपराधियों की मंशा शादी रोकने की ही रही होगी तो नैंसी का अपहरण व हत्या ना करके अपराधियों ने रानी या रानी के परिवार के लोगों को निशाना क्यों नहीं बनाया ?

परिचय :
नैंसी झा (12 वर्ष) : पोस्टमार्टम के आधार पर प्रशासन के बयान के अनुसार जिसकी गला दबाकर हत्या हुई है व परिवार के अनुसार जिसकी अपहरण के बाद दुष्कर्म, एसिड अटैक व नस काट कर हत्या हुई.

रानी झा (काल्पनिक नाम) : नैंसी की बुआ. नैंसी के पापा की चचेरी बहन है. जिसकी शादी 26 मई को होनी थी.

लालू झा व पवन झा : महादेवमठ गांव के देवचन्द्र झा के पुत्र लालू व पवन दोनों सगे भाई हैं. जिससे पीड़ित के परिजनों को 5 साल पहले मार-पिट हुआ था.

रविन्द्र नारायण झा : नैंसी के पिता व आवासीय मुक्तिनाथ पब्लिक स्कुल के संचालक है.

राघवेन्द्र झा : इस केस के मुख्य गवाह व नैंसी के चाचा जिसने लालू और पवन झा को नैंसी को अपहरण करते हुए देखा. ओर पुलिस ने जिनके साथ पूछताछ के नाम पर ज्यादती की.

पंकज झा : नैंसी के चाचा जिनके साथ पुलिस ने पूछताछ के नाम पर ज्यादती की गई.

अज्ञात बाइक सवार : जिसको नैंसी के चाचा ने देखा.

अज्ञात महिला : जिसनें अज्ञात बाइक सवार को देखा और परिजन को उसका हुलिया बताया.

आपको बता दें की मधुबनी के इस बहुचर्चित नैंसी हत्याकांड अब नया मोड़ ले सकती है. साथ ही यह भी जानकारी हो की आरोपी लालू झा व पवन झा पर नैंसी के अपहरण या हत्या करने का गुनाह साबित नहीं हो सका है. घटना के लगभग 1 सप्ताह से अधिक बीतने के बाद विभिन्न राजनितिक दलों के लोगों ने नैंसी के गांव पंहुच रहे है. साथ ही इस प्रकरण ने नेशनल मीडिया में भी अच्छी-खासी जगह बना ली है. #Justice4nancy मुहीम को समर्थन कर रहे लोग न्याय के लिए झंझारपुर की एएसपी निधि रानी के नेतृत्व में गठित एसआईटी की पहली रिपोर्ट आने की टकटकी लगाये हुए है. वहीं मिली जानकारी के अनुसार बिहार के मुख्यमंत्री खुद इस प्रकरण की मोनिटरिंग कर रहे है. इसके परे मधुबनी के एसपी दीपक बरनवाल ने जल्द से जल्द मामले की उद्भेदन करने की बात कही है.