बिहार के स्थापित
हो चुके हिंदी भाषी अखबार दैनिक जागरण ने अपने हिंदी भाषा कार्यक्रम में मैथिली को
बोली के रूप में शामिल किया। कार्यक्रम के लिए मैथिली के प्रतिनिधि वक्ता के रूप
में बिभूति आनंद भैया थे, जिन्होनें उस कार्यक्रम का हिस्सा बनने से यह कहते हुए इनकार
कर दिया की मैथिली बोली नहीं भाषा है। बढ़ते फेसबुक पोस्ट से अख़बार को मैथिली को हिंदी
की बोली कह कर शामिल किये जाने पर विरोधाभास का भान हुआ तो अगले दिन उक्त सत्र के
लिए बोली के रूप में शामिल मैथिली को हटा लिया गया। लेकिन आज फिर आमंत्रण पत्र में
अखबार ने मैथिली को बोली की श्रेणी में दिखाया है... इस बार वक्ता के रूप में पटना
विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग के हेड प्रोफेसर वीरेंद्र झा हैं।
विजयदेव झा भैया लिखते
हैं की... सन 2003
में जब मैथिली
के संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल करवाने का अभियान चल रहा था। भारत सरकार को
सौंपे जाने वाले मेमोरेंडम लिखने और दस्तावेज जुटाने की तैयारी चल रही थी।
मेमोरेंडम में
मैथिली का इतिहास बताना था जिसमे पटना विश्वविद्यालय में मैथिली का शामिल होना एक
अहम बिंदु था। पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग में पटना विश्वविद्यालय के उस
सीनेट की बैठक और संबंधित दस्तावेजों की कॉपी थी जिसके आधार पर मैथिली की पढ़ाई
शुरू हुई थी।

विद्यापति सेवा
संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू को इन दस्तावेजों को प्राप्त करने के लिए
श्री वीरेंद्र झा साहब के पास भेजा गया। किसी मैथिली प्रेमी और शिक्षक के लिए इससे
बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि उसकी भाषा संविधान के आठवीं अनुसूची में
शामिल हो रही है।
लेकिन प्रोफेसर
वीरेंद्र झा एकाएक भड़क गए उन्होंने बैद्यनाथ चौधरी को डांटते हुए कहा कि आप फालतू
के अभियान में मुझे घसीट रहे हैं मैं प्रोफेसर हूं मुझे आंदोलन से क्या लेना देना।
आपकी हिम्मत कैसे हुई कि आप मेरे पास दस्तावेज लेने के लिए आ गए।
उपरोक्त वाकये को पढ़ने के बाद भी अगर कोई प्रोफ़ेसर बीरेंद्र झा से मैथिली के सम्मान के लिए कुछ
अपेक्षा रखते हैं तो शायद आप बकलोल हैं। और अगर धोखे से कल तक वह मैथिलों के अपेक्षा पर खड़े हो जाते हैं तो वह बकलोल हैं।
फिलहाल मिथिला राज्य निर्माण कार्य को पोसपोंड कीजिये और बम्पर ऑफर का फायदा उठाइये... मैथली को बोली कहे जाने को लेकर सोशल साइट्स पर ट्रोल हो रहे प्रोफेसर बीरेंद्र झा जहां मिले मुंह पर खुद गमछा ओढीये और उनको भी मुंह पर गमछा ओढा के फुला दीजिये।
उपरोक्त शब्द का संकलन अच्छा लगा तो लिख दिए हैं। खैर ऐसा कुछ होने वाला नहीं है... हो जाए तो कोई बुरा भी नहीं है। क्योंकि खट्टर कक्का कहते हैं की चच्चा के सामने बच्चा
सबका एक-आध गलती क्षम्य होता है।
नहीं तो उनका बेटा पोता कहता हुआ मिलेगा...
‘तुम कितने बिभूति लाओगे, हर घर से बिरेंदर
निकलेगा'
बिहार के स्थापित हो चुके हिंदी भाषी अखबार दैनिक जागरण ने अपने हिंदी भाषा कार्यक्रम में मैथिली को बोली के रूप में शामिल किया। कार्यक्रम के लिए मैथिली के प्रतिनिधि वक्ता के रूप में बिभूति आनंद भैया थे, जिन्होनें उस कार्यक्रम का हिस्सा बनने से यह कहते हुए इनकार कर दिया की मैथिली बोली नहीं भाषा है। बढ़ते फेसबुक पोस्ट से अख़बार को मैथिली को हिंदी की बोली कह कर शामिल किये जाने पर विरोधाभास का भान हुआ तो अगले दिन उक्त सत्र के लिए बोली के रूप में शामिल मैथिली को हटा लिया गया। लेकिन आज फिर आमंत्रण पत्र में अखबार ने मैथिली को बोली की श्रेणी में दिखाया है... इस बार वक्ता के रूप में पटना विश्वविद्यालय के मैथिली विभाग के हेड प्रोफेसर वीरेंद्र झा हैं।
विजयदेव झा भैया लिखते हैं की... सन 2003 में जब मैथिली के संविधान के आठवें अनुसूची में शामिल करवाने का अभियान चल रहा था। भारत सरकार को सौंपे जाने वाले मेमोरेंडम लिखने और दस्तावेज जुटाने की तैयारी चल रही थी।

विद्यापति सेवा
संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू को इन दस्तावेजों को प्राप्त करने के लिए
श्री वीरेंद्र झा साहब के पास भेजा गया। किसी मैथिली प्रेमी और शिक्षक के लिए इससे
बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि उसकी भाषा संविधान के आठवीं अनुसूची में
शामिल हो रही है।
उपरोक्त वाकये को पढ़ने के बाद भी अगर कोई प्रोफ़ेसर बीरेंद्र झा से मैथिली के सम्मान के लिए कुछ अपेक्षा रखते हैं तो शायद आप बकलोल हैं। और अगर धोखे से कल तक वह मैथिलों के अपेक्षा पर खड़े हो जाते हैं तो वह बकलोल हैं।
फिलहाल मिथिला राज्य निर्माण कार्य को पोसपोंड कीजिये और बम्पर ऑफर का फायदा उठाइये... मैथली को बोली कहे जाने को लेकर सोशल साइट्स पर ट्रोल हो रहे प्रोफेसर बीरेंद्र झा जहां मिले मुंह पर खुद गमछा ओढीये और उनको भी मुंह पर गमछा ओढा के फुला दीजिये।
उपरोक्त शब्द का संकलन अच्छा लगा तो लिख दिए हैं। खैर ऐसा कुछ होने वाला नहीं है... हो जाए तो कोई बुरा भी नहीं है। क्योंकि खट्टर कक्का कहते हैं की चच्चा के सामने बच्चा
सबका एक-आध गलती क्षम्य होता है।


