शनिवार, 31 अगस्त 2019

बेनीपट्टी उपकारा का आज विधिवत उद्घाटन हो गया


बेनीपट्टी उपकारा का आज विधिवत उद्घाटन हो गया. समारोह में विधायक भावना झा - फैयाज अहमद का आमंत्रित होकर अनुपस्थित रहना और सांसद अशोक कुमार यादव - एमएलसी दिलीप कुमार चौधरी को आमंत्रित नहीं करना चर्चा का विषय रहा. इसके अलावे अच्छी बात रही कि बांकी नेताओं की गैरमौजूदगी में भी मंत्री विनोद नारायण झा ने जेल उद्घाटन का कोई क्रेडिट नहीं लिया, इसके अलावे उन्होंने इस बात का जिक्र जरूर किया कि उन्होंने हर सदन में जब भी मौका मिला बेनीपट्टी उपकारा के लिए आवाज उठाया - सवाल किए.

हालांकि जेल उद्घाटन का पूरा श्रेय बिहार के जेल आईजी मिथिलेश मिश्रा सर जो कि 6 साल पहले आज ही के दिन पहली पोस्टिंग पर बेनीपट्टी के एसडीएम बनकर आये थे उनको जाता है. वह आज उद्घाटन समारोह में आये भी थे - उनका संबोधन काफी बेहतर था. अपने संबोधन में मंत्री विनोद नारायण झा ने भी मिथिलेश मिश्रा की जमकर तारीफ़ की. स्वभाविक है बेनीपट्टी उपकारा शुरू होने का पूरा श्रेय बिहार के जेल आईजी मिथिलेश मिश्रा सर को जाता है इसमें कोई दो राय नहीं है.

लेकिन अब जब जेल का उद्घाटन हो गया है तो यहां के अपराधियों को इस जेल की लाज रखनी होगी - क्योंकि कोई आपके लिए कॉलेज खोल सकता है - स्ट्रीम चयन कर एडमिशन तो आपको ही लेना है ❤️

सोमवार, 12 अगस्त 2019

बेनीपट्टी सार्वजनिक शौचालय की घेराबंदी नही होगी


बेनीपट्टी सार्वजनिक शौचालय की घेराबंदी नही होगी. बता दें कि बेनीपट्टी थाने की घेराबंदी हो रही है. थाने के जमीन में सार्वजनिक शौचालय है जो कई दशक पूर्व से है. जिसका पुनर्निर्माण पिछले साल हुआ था. उक्त शौचालय के करीब तक थाने की घेरेबंदी की दीवाल पंहुची थी - जिसके बाद यह आशंका की जा रही थी कि शौचालय को भी घेराबंदी कर अंदर ले लिया जाएगा.

लेकिन इस पर त्वरित संज्ञान लेते हुए बेनीपट्टी डीएसपी Pushkar Kumar जी ने रविवार को निरीक्षण करते हुए इन आशंकाओं पर अंकुश लगा दिया है. उन्होंने यह भरोसा दिलाया है कि सार्वजनिक शौचालय पूर्व की भांति ही रहेगा - उसकी कोई घेराबंदी नहीं होगी और शौचालय का मुख्य गेट सड़क के तरफ पूर्व की तरह ही खुला रहेगा.

एसडीओ पुष्कर कुमार जी के निरीक्षण के समय मौके पर मौजूद रहे मिथिला स्टूडेंट यूनियन के Ashish Jha Chunnu ने यह जानकारी दी है. निरीक्षण के दौरान बेनीपट्टी थानाध्यक्ष, बेनीपट्टी पंचायत के पंचायत समिति सदस्य आनंद कुमार झा, बेनीपट्टी पंचायत के पैक्स अध्यक्ष योगीनाथ झा बबलू सहित कई स्थानीय लोग-व्यवसायी भी मौजूद थे.

इसमें ना किसी की जीत हुई है ना किसी की हार हुई है. जनता के हित में प्रशासन ने नैतिकता के साथ समय रहते पहल किया है - धन्यवाद बनता है.

फोटो - Murari

शनिवार, 10 अगस्त 2019

बहुत संघर्ष के बाद बेनीपट्टी को यह सार्वजनिक शौचालय नसीब हुआ है


बेनीपट्टी शौचालय 6 अक्टूबर - सुनते ही जेहन में वह भीड़ जरुर याद आती है जिसमें बेनीपट्टी थाने की जमीन कम लोगों का सिर अधिक दिख रहा था. जिस बंदी में बेनीपट्टी के तमाम दुकानें स्वतः बंद हुई थी. सड़कों पर हजारों लोग थे जो एक आन्दोलन-जिद्द और संघर्ष का परिणाम था. दर्जनों लोगों पर दर्जनों धाराओं में मुकदमा हुआ था. आज यह याद दिलाने का कारण यह है कि बेनीपट्टी में थाने के घेराबंदी चल रही है. घेरा बंदी की दीवाल बेनीपट्टी मुख्यालय के एकमात्र सार्वजनिक शौचालय तक पंहुची है जिसे बेनीपट्टी प्रशासन घेराबंदी करके थाने के अंदर लेने की कवायद कर रही है. अगर ऐसा हो जाता है तो यह शौचालय थाने के कब्जे में चला जायेगा - जिसका लाभ पुलिसकर्मियों और उनके परिवार वालों के अलावे किसी को नहीं मिलेगा. थाने के गेट से अंदर जाने पर पुलिसकर्मियों की गालियां मिलेगी. हो सकता है इस आशंका पर अभी प्रशासन से यह जवाब मिले कि कोई रोक नहीं होगा थाने के गेट से शौचालय के अंदर जाने के लिए. लेकिन जो अधिकारी यह वादा करेंगे वह चंद महीनों सालों में दुसरे जगह तबादला होकर चले जायेंगे और इसका खामियाजा यहां की जनता को भुगतना पड़ेगा. जबसे यह जानकारी मिली है मन में आक्रोश है - बहुत संघर्ष के बाद बेनीपट्टी को यह सार्वजनिक शौचालय नसीब हुआ है इसको अपने कब्जे में लेना इतना आसान नहीं होगा प्रशासन के लिए.

आप लोग राय दें क्या प्रशासन जो कर रही है वह सही है ?

सोमवार, 5 अगस्त 2019

आज इस तस्वीर की काफी अहमियत है - कश्मीर हमारा है


आज इस तस्वीर की काफी अहमियत है - जिस आदमकद प्रतिमा के सामने देश के प्रधान और देश के गृह मंत्री सिर झुका रहे हैं वह प्रतिमा जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की है.

जब हिंदू महासभा से विमुख होकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की, तो 1952 दिसम्बर में इसका पहला अधिवेशन कानपुर में हुआ. निशाने पर शुरू से ही कश्मीर था. नारा दिया गया- एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे. कानपुर अधिवेशन इसी संकल्प के साथ शुरू किया गया कि कश्मीर के पूर्ण एकीकरण को देशव्यापी मुद्दा बनाया जाए. उससे पहले अटलजी को साथ लेकर पूरे देश में श्यामा प्रसाद मुखर्जी दौरा भी कर चुके थे, ऐसे ही एक दौरे के दौरान दोनों से एल के आडवाणी कोटा स्टेशन पर मिले थे. उन दिनों आडवाणी कोटा में ही थे.

जम्मू कश्मीर सरकार ने एक नियम बना दिया था कि जो को भी जम्मू कश्मीर में भारत से आएगा, उसे वहां आने के लिए राज्य सरकार से परमिट लेना पड़ेगा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ये बात काफी नागवार गुजरी और उन्होंने बिना परमिट कश्मीर में जाने की योजना बनाई. डा. मुखर्जी कई साथियों के साथ, कश्मीर के लिए 8 मई 1953 को एक पैसेंजर ट्रेन से निकले, रेल से उन्होंने पहले पंजाब पार किया. पूरा पंजाब मुखर्जी को देखने के लिए उमड़ा जा रहा था. उनका अंतिम पड़ाव राव नदी के किनारे माधोपुर चैकपोस्ट थी. रावी नदी जम्मू कश्मीर और पंजाब के बीच सीमा रेखा के तौर पर थी.

रावी नदी पर जो पुल था, उसका बीच का स्थान दोनों राज्यों के बीच की सीमा मानी जाती थी. जब जीप मुखर्जी और उनके साथियों को लेकर पुल के बीचोंबीच पहुंची तो वहां जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी एक बड़े दस्ते के साथ खड़े हुए थे. उन्होंने मुखर्जी को मुख्य सचिव का एक लैटर दिखाया, जिसके मुताबिक मुखर्जी के लिए राज्य में प्रवेश की मनाही की बात लिखी थी. डा. मुखर्जी ने उस आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया और ऐलान किया कि वो कश्मीर जाने के लिए दृढ प्रतिज्ञ है, अपने देश के अंदर किसी भी स्थान पर जाने के लिए मुझे किसी भी इजाजत की जरुरत नहीं.

तत्काल पुलिस अधीक्षक ने पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत उनकी गिरफ्तारी का ऑर्डर निकाला. मुखर्जी को हिरासत मे ले लिया गया, उनके दो सहयोगी वैद्य गुरुदत्त और टेकचंद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. चूंकि अटल बिहारी बाजपेयी इस यात्रा पर बतौर पत्रकार साथ थे, इसलिए वो गिरफ्तारी से बच गए. लेकिन उनसे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनसे कहा, ‘तुम वापस जाओ और देशवासियों को बताओ कि डा. मुखर्जी ने प्रतिबंध आदेशों की अवहेलना करते हुए जम्मू एंव कश्मीर में प्रवेश किया है और वह भी बगैर परमिट के, भले ही एक बंदी के रुप में क्यों ना हो’

डा. मुखर्जी को श्रीनगर से दूर निशात बाग के निकट एक छोटे से घर को अस्थाई जेल बनाकर नजरबंद कर दिया गया. 23 जून को देश को फिर उनकी मौत की ही जानकारी मिली कि कैसे उनको अचानक 10 मील दूर एक हॉस्पिटल मे भी ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच पाई. आज तक देश सच्चाई का सही पता नहीं लगा पाया है.

जबकि अटल मुखर्जी की बात मानकर उस वक्त वापस लौट गए थे, लेकिन उनको उन्होंने पंजाब में मुखर्जी का शानदार स्वागत देखा था. ऐसे में जब मुखर्जी की मौत की खबर आई तो उनको लगा कि उनको भी चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए. अटल बिहारी बाजपेयी ने एक इंटरव्यू में बताया कि तभी मैंने तय कर लिया कि डा. मुखर्जी के सपनों को, अधूरे कामों को पूरा करना है. जिसके बाद वह राजनीति में सक्रीय रूप से आये... बीजेपी देश में आई और आज अटल जी के शिष्य मोदी-शाह के नेतृत्व में श्यामा प्रसाद मुखर्जी का अधूरा सपना पूरा हुआ है.

#KashmirHamaraHai