शुक्रवार, 31 मार्च 2017

शराब को 'गुटखा' और पेट्रोल को जो 'पानी' बना दे... शायद उसे 'सरावगी' कहते है !


25 मार्च को दरभंगा के लहेरियासराय के पास जमीनी रंजिश में कबिलपुर निवासी मनोज चौधरी को भरे बाजार में गुप्ता स्वीट्स के पास पेट्रोल छिड़क कर जला दिया जाता है. अगले तीन दिनों तक सामान्य रूप से अख़बारों में 6ठें व 7वें पेज पर इस घटना को जगह मिलती है. बाजार में चर्चाओं का बाजार गर्म होता है कि आरोपी गुप्ता स्वीट्स व उसका परिवार विधायक संरक्षित है. सुनी सुनाई बात है कि स्थानीय विधायक ने घटना के दिन से ही अपनी रसूख का परिचय उसी तरह देना शुरू कर दिया था जिस तरह अपने भाई के शराब पिने के वाबजूद भी गुटखा खाने का अपराध साबित कर दिया था. पूरी सेटिंग गेटिंग हो चुकी थी. पिछले बार की तरह शराब के जगह गुटखा के तर्ज पर शराब के जगह पानी छिड़क कर जलाने की बात कोर्ट में साबित करने की तैयारी चल रही थी. हालांकि इसकी पुष्टि मै नहीं करता हूँ. आगे विधायक के चुप्पी के कारण सोशल साइट्स पर लोगों का आक्रोश जातिगत शब्दों के संबोधन के साथ लगातार प्रस्फुटित हो रहा था. अभी तक क़ानूनी प्रकिया में पीड़ित मनोज चौधरी के गांव कबिलपुर के लोगों के हाथ मायूसी ही थी. इन सब के बीच अर्धमृत अवस्था में मनोज चौधरी को इलाज के लिए दिल्ली ले जाया गया. इन्ही सब के बीच कानून के रखवाले अपने ईमान को लीलाम करने की प्रक्रिया शुरू कर चुके थे. न्याय के लिए गुहार लगा रहे मनोज चौधरी के गांव व परिवार के लोग दर-दर भटक रहे थे. इसी बीच दरभंगा प्रशासन द्वारा बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज की गई. 
अब स्थिति कुछ हद तक कानून के बिकाऊ पदाधिकारियों के कमान से बाहर निकलती हुई दिख रही थी. लेकिन इसके वाबजूद भी प्रशासन और स्थानीय दलालों ने दलाली से हिम्मत नहीं हारी. स्थिति की नाजुकता को देखते हुए सदर डीएसपी दिलनवाज अहमद ने घटना के आरोपितों के खिलाफ स्पीडी ट्रायल चलाने की बात कहते हुए स्थिति को कुछ हद तक अपने पक्ष में करना चाहा. अगला घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा की राजनितिक दलों ने भी इसमें लगे हाथ इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद किया. फिर भी घटना से जुडी हुई सभी खबरें अख़बारों में पिछले पन्नो में ही दबी हुई थी. वहीं दूसरी तरफ मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने घटना के विरोध में दरभंगा में कैंडल मार्च निकालकर अपना विरोध दर्ज कराया. अब तक दरभंगा के आम जनमानस में अंतर्मन की क्रोधित ज्वाला प्रस्फुटित होने को व्याकुल हो चुकी थी. 5 दिन बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होता देख लोगों को कानून से भरोशा डिगने लगा था. सब को यह भान हो चुकी थी की शायद इस बार भी दरभंगा प्रशासन पेट्रोल को पानी साबित कर देगी. लेकिन जब तक ऐसा कुछ होता मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने इस घटना के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए 31 मार्च को दरभंगा बंद का आह्वान कर दिया. इसकी खबर स्थानीय विधायक संजय सरावगी को लगी. घटना के बाद से ही दरभंगा छोड़कर पटना में डेरा जमाए हुए विधायक सरावगी ने स्थिति को भांपते हुए अपनी रणनीति में बदलाव किया. बदलाव ऐसा किया कि जैसे वो जनता को मुर्ख समझते हो. विधायक ने घटना के 5 दिन बाद यानी 30 तारीख को दरभंगा के जनता के प्रति सहानुभूति दिखाते विधानसभा के शून्यकाल में लिखित प्रश्न में घटना के संदर्भ में यह मांग किया कि, पीड़ित मनोज चौधरी का बेहतर इलाज व दोषी पुलिस पदाधिकारी पर कार्रवाई की जाय. यहां गौर करने वाली बात यह है कि विधायक ने घटना के आरोपित को सजा देने की बात कहीं नहीं उल्लेख किया है. 
(विधायक का लिखा हुआ पत्र यहां संलग्न है) 
विधायक के लिखित पत्र से इस संभावना से कहीं इंकार नहीं किया जा सकता है की सारा सेटिंग फेल होने के बाद विधायक ने आरोपितों का बचाव करते हुए घटना का सारा ठीकरा प्रशासन के उपर फोड़ने का प्रयास किया है. इसका कारण हमनें ऊपर भी उल्लेख कर दिया है कि घटना के बाद चर्चाओं का बाजार गर्म रहा की आरोपित गुप्ता स्वीट्स परिवार विधायक के संरक्षित है. हालांकि इस बात की पुष्टि हम नहीं करते है. यह बात 30 तारीख के दिन की थी. अब तक मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने अगले दिन यानी 31 मार्च को दरभंगा बंद व पुलिस अधीक्षक कार्यालय के घेराव की घोषणा कर दी थी. 30 तारीख को रात में दिल्ली से अचानक यह खबर आयी की पीड़ित मनोज चौधरी का निधन हो गया. देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में यह खबर सोशल साइट्स पर आग की तरह फैल गयी. इस सुचना के साथ प्रशासन की नींद उड़ गई. एक तो 31 मार्च को होने वाले दरभंगा बंद के आह्वान और दूसरी तरफ मनोज चौधरी की इलाज के क्रम में मौत की खबर ने प्रशासन को बेचैन कर दिया. प्रशासन ने दरभंगा के चप्पे-चप्पे पर रातोंरात पुलिस बल की तैनाती कर दी गई. मनोज चौधरी की मौत की खबर की सुचना के बाद लोगों का गुस्सा उबाल पर आ चुका था. दरभंगा के आम-आवाम अपने अधिकार और न्याय के लिए आवाज बुलंद करने के लिए नया सवेरा का इंतज़ार कर रहे थे. मनोज चौधरी की मौत होने की खबर के बाद गमगीन रात बिताकर दरभंगा ने अहले सुबह नया सवेरा देखा. पीले टी-शर्ट में मिथिला स्टूडेंट यूनियन के नौजवानों की टोली सड़कों पर थी. दरभंगा के हर चौक चौराहों पर यूनियन के कार्यकर्त्ता बंद को सफ्फल बनाने में लगे हुए थे. यूनियन के कार्यकर्ताओं की टोली देखते ही देखते प्रत्याशित भीड़ में तब्दील हो गई. लोग दरभंगा बंद के समर्थन में नैतिक रूप से जोर-शोर से भाग ले रहे थे. अधिकांश दुकानें स्वतः बंद थी. तो कुछ दुकाने खुली भी थी तो भीड़ के आग्रह पर दुकानदारों ने भी खुली हुई दुकाने बंद कर दरभंगा बंद में अपना समर्थन दिया. शहर से गुजरने वाली सभी सड़के शांत चीत थी. 
दरभंगा स्टेशन पर बिहार संर्पक क्रांति सहित कई ट्रेनों की आवाजाही पर रोक लग चुकी थी. सड़कों पर आक्रोश की आवाज न्याय की मांग करते हुए बुलंद हो रही थी. लोग सड़कों पर दरी बिछाकर उस कानून व्यवस्था के नुमांइदों के इंतज़ार में बैठे हुए थे, जो कहीं न कहीं अब तक के इस स्थिति और परिस्थिति दोनों के जिम्मेवार हैं. अब तक के दरभंगा बंद ने इलेक्त्रोनिक्स व वेब मीडिया में अपना अच्छा खासा जगह बना लिया था.
छिटफुट घटनाओं के बीच तनावपूर्ण माहौल में देर दोपहर में अचानक राजनितिक दलों ने बंद कमरे में प्रशासन के साथ बैठक कर ली. जल्दी से जल्दी वार्ता करने में सबसे अधिक दिलचस्पी भारतीय जनता पार्टी की रही. इसका मुख्य संभावित कारण दरभंगा के विधायक संजय सरावगी का बीजेपी से होना बताया जा रहा है. इस घटना में पेट्रोल की छीटें कहीं ना कहीं विधायक पर भी पड़ने की संभावना बताई जा रही है. वहीं कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आये एक स्थानीय बीजेपी नेता ने अपने फेसबुक वाल 4 बजे के करीब में वार्ता के पश्चात लिखा की वार्ता हो गई है, इसी के साथ आंदोलन समाप्त. लेकिन उस पोस्ट सहित कहीं भी वार्ता में हुई बातों को स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया. इसके बाद बीजेपी के प्रेस रिलीज में यह बताया गया कि बंद कमरे में हुई वार्ता बैठक में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि सहित मिथिला स्टूडेंट यूनियन के बिहार प्रभारी अविनाश भारद्वाज भी मौजूद थे. लेकिन यह बात पूर्णतः झूठ थी. जिसकी पुष्टि अविनाश भारद्वाज ने स्वंय की है. अविनाश भारद्वाज ने बताया कि वार्ता में एमएसयू ने भाग नही लिया है. वार्ता होने की बात सामने आ रही है जो की पूर्णतः गलत है. 

वहीं इस सब के अलावे बीजेपी के नेताओं व कुछ मिथिलावादी दलों के माध्यम से आंदोलन को कमजोर व दरभंगा बंद को असफल करने के लिए दोपहर में लहेरियासराय थानाध्यक्ष के सस्पेंड होने की झूठी अफवाह फैलाई गई. जबकि वॉयस ऑफ़ दरभंगा न्यूज़ पॉर्टेल के अनुसार 5 बजे तक ऐसी कोई कार्रवाई की बात सामने नही आयी थी. आज के पुरे प्रकरण का निचोड़ निकाला जाय तो यह बात से कोई भी इंकार करने से किसी को भी असहज महसूस होगी की बीजेपी सहित कुछ और पार्टी के लोग दिवगंत मनोज चौधरी के लाश पर राजनीति करने से बाज नहीं आये. 
उधर मिथिला स्टूडेंट यूनियन की दिल्ली टीम ने दिल्ली में रहने वाले मैथिलों को इस आंदोलन में भाग लेने के आह्वान के साथ सैकड़ों मैथिलों के साथ शाम में 5 बजे जंतर-मंतर पंहुची. जहां आक्रोशित लोगों ने जंतर-मंतर के पास स्थित जदयू कार्यालय में जमकर तोड़-फोड़ की. जिसके बाद जंतर-मंतर पर मनोज चौधरी को श्रधांजली देने के लिए कैंडल मार्च निकाला गया. इस बाबत यूनियन के दिल्ली अध्यक्ष प्रकाश मैथिल ने बताया की घटना के खिलाफ मांगो से सम्बंधित मांग युक्त ज्ञापन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सौंपा गया है. साथ ही उन्होंने बताया कि जदयू द्वारा यूनियन पर एफआईआर भी दर्ज कर दिया गया है. 

अब देखने वाली बात यह है कि मिथिला स्टूडेंट यूनियन की दृढ़ता के आगे दिवगंत मनोज चौधरी की लाश पर विभिन्न राजनीतिक दल के लोग राजनितिक गोटी सेंकने यानी प्रशासन की दलाली कब तक कर पाते है. साथ ही यह भी देखना दिलचस्प होगा की जिस तरह से मिथिला स्टूडेंट यूनियन ने देर शाम तक दरभंगा बंद के आह्वान के साथ सड़कों पर तटस्थ रहते हुए बंद कमरे के जगह बिच सड़क पर प्रशासन को वार्ता करने के लिए मजबूर कर दिया, साथ ही मिथिला स्टूडेंट यूनियन के द्वारा दरभंगा बंद के साथ घोषित...

1. पीड़ित परिवार के एक परिजन को सरकारी नौकरी दिया जाय।
2. पीड़ित परिवार के परिजन को 50 लाख रुपया दिया जाए।
3. दोषी थाना प्रभारी व अन्य पुलिसकर्मी को बर्खास्त किया जाए।
4. दोषियों को फांसी की सजा दिया जाए।
5. घटना वाले जगह को मनोज चौधरी पथ घोषित किया जाए।

उपरोक्त मांगो पर शाम में वीआईपी रोड पर जनता के सामने हुए यूनियन और प्रशासन की वार्ता में जो आश्वासन मिली है वह प्रशासन और सरकार कब तक पूरी करती है. या फिर से आने वाले दिनों में आंदोलन का विस्तृत और स्वरूप देखने को मिलता है...

आपको बता दें की दोपहर में बीजेपी के प्रतिनिधियों के साथ कमरा बंद वार्ता को मिथिला स्टूडेंट यूनियन के नही मानने के बाद देर शाम तक एमएसयू द्वारा दरभंगा बंद को वापस नही लिया गया था. जिसके उपरांत प्रशासन की टीम के साथ डीएसपी दिलनवाज अहमद ने वीआईपी रोड पर यूनियन के कार्यकर्ताओं व जनता के सामने यूनियन के पांचों मांगो को संज्ञान लेते हुए 'दोषियों को फांसी की सजा दिये जाने' की मांग को कानून के अधीन बताते हुए बांकी सभी 4 मांगो पर 15 दिन के अन्दर साकारात्मक पहल करने की बात कही है. इसकी जानकरी मिथिला स्टूडेंट यूनियन के बिहार प्रभारी अविनाश भारद्वाज ने दूरभाष पर दी है.  

शीर्षक को यथा लेने वाले अन्यथा ना लें... शराब को 'गुटखा' और पेट्रोल को जो 'पानी' बना दे... शायद उसे 'सरावगी' कहते है !

अंतर्द्वंद लेख पेट्रोल कांड दरभंगा : बिदेश्वर नाथ झा 'बिकास'

बुधवार, 15 मार्च 2017

संतोष झा... कैसे एक किसान परिवार का बेटा जुर्म की दुनिया का 'सरताज' बन गया


बिहार में अपराध की दुनिया का कुख्यात नाम संतोष झा। दरभंगा में हुए डबल इंजिनियर हत्याकांड के बाद चर्चा में आये सजायाफ्ता संतोष झा जिस तरह से लगातार लुट-हत्याओं के साथ अपराध की दुनिया में खुद को स्थापित किया वह कहीं ना कहीं प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण रहा और संतोष झा को जानने वालों के लिए अप्रत्याशित था। कभी सामान्य रूप से आम नागरिक की तरह जिन्दगी जीने वाला संतोष झा के अपराध की दुनिया में आने की कहानी पूरी तरह फ़िल्मी है, जिससे आज भी अधिकांश लोग अंजान हैं।

दबंग लुक के साथ गोरे चेहरे पर महंगा चश्मा, काले रंग की फुल टी-शर्ट और ब्रांडेड पैंट की शौक रखने वाला संतोष झा ना तो फिल्म अभिनेता है और न हीं कोर्इ वीवीआर्इपी। बल्कि वह कानून की नजर में सजायाफ्ता है, यह उत्तर बिहार का र्इनामी तथा बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का चीफ है जिसके सिर पर हत्या, लूट, रंगदारी, भयादोहन, विस्फोटक अधिनियम तथा आर्म्स एक्ट के तहत लगभग में 29 से अधिक मामले दर्ज हैं। इस शख्स की पहचान कुछ ऐसी है की पुलिस कस्टडी में होने के वाबजूद सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, पश्चमी चंपारण, गोपालगंज, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, दरभंगा तथा शिवहर जिले की पुलिस को नाकोदम कर रखा है।

पिता की पिटार्इ के बाद माओवादियों की जमात में शामिल होने वाले संतोष की जिंदगी की कहानी भी बड़ी अजीब है। शिवहर जिले के पुरनहिया थाना अंतर्गत दोसितयां गांव निवासी संतोष झा के पिता चंद्रशेखर झा कभी गांव के हीं दबंग जमींदार परिवार से तालुक रखने वाले नवल किशोर यादव के जीप का ड्राइवर था। पंचायत भवन बनाने के सवाल पर ही संतोष झा के पिता चंद्रशेखर झा की गांव के उन दबंगों से ठन गयी, जिसके घर वह नौकरी कर रहे थे। बस इतनी सी बात पर दबंग जमींदार ने चंद्रशेखर झा की जमकर पिटार्इ की। पिता पर जमींदारों के जुल्म ने शांत संतोष के चेहरे पर बदले की चिंगारी जला दी। उसके बाद संतोष झा माओवादियों के खेमें में मिल कर बदला लेने की कसम खायी और वर्ष-2003 में जमींदार नवल किशोर यादव के घर पर माओवादियों ने हमला कर इरादे स्पष्ट कर दिये। अदौड़ी में बैंक लूट, तरियानी के नरवारा में बैंक लूटने जैसी वारदात के अलावे देकुली पुलिस पिकेट से हथियार लूट के मामले में भी संतोष का नाम उछला था।


पिता की पिटार्इ का बदला संतोष को इस कदर खौला दिया था कि उसने 15 जनवरी 2010 को अपने सहयोगियों के साथ सीतामढ़ी के राजोपटटी में पूर्व जिला पार्षद नवल किशोर यादव को उसके घर के बाहर गोलियों से भून दिया था। उसने उक्त हत्या को पिता की पिटार्इ का बदला बताया था। नक्सलियों से अलग होकर उसने बदला लेने के लिए उक्त हत्या को अंजाम दिया था। बाद के दिनों में नक्सलियों से उसका जुड़ाव भी बढ़ गया और उसने उससे अलग अपना संगठन बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी बना लिया। नक्सली गौरी शंकर झा की हत्या के मामले में भी संतोष मुख्य आरोपित है। 24 नवंबर 2011 को गौरी शंकर झा को उसके घर पर हमला करने के बाद गोलियों से भून दिया गया था। वर्ष-2005 में संतोष झा को एसटीएफ ने पटना के एक होटल से गिरफ्तार किया था। बाद में पांच साल तक जेल में रहने के बाद वह जमानत पर छूट कर खूनी खेल को जारी रखा। इसके बाद वर्ष-2012 में रांची के बुटी मोड़ से वह अपने सहयोगी मुकेश पाठक के साथ पूर्वी चंपारण जिले की पुलिस के हत्थे चढ़ा था।



दरभंगा के डबल इंजिनियर हत्याकांड के बाद पुलिस की गिरफ्त में आये संतोष झा जब 15 फरवरी 2015 की दोपहर जब सीतामढ़ी पुलिस की कस्टडी में बख्तरबंद वैन से बाहर निकला तो जिला मुख्यालय, डुमरा स्थित व्यवहार न्यायालय के पास सैकड़ों की तादाद में मौजूद भीड़ उसकी एक झलक पाने के लिए धक्का मुक्की पर उतारू था। जिस व्यक्ति के नाम से कंस्ट्रक्शन कंपनियां कांप उठती थी, वह कस्टडी में पूरे इत्मीनान से दबंग की तरह हाथ हिला कर भीड़ का अभिवादन कर रहा था।



17 फरवरी 2012 को मोतिहारी पुलिस की चुक के कारण कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर निकला यह व्यकित उसके बाद की जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा बन गया कि पुलिस को उसे पकड़ने के लिए एक लाख रुपये का इनाम घोषित करना करना पड़ा। मोतिहारी जेल से बाहर आने के बाद संतोष झा का लाइफ स्टाइल भी बदल गया। इसके बाद तो वह कर्इ आपराधिक वारदातों को अंजाम देने के बाद रंगदारी की रकम से दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की की राह गिनने लगा। सीतामढ़ी जिले की पुलिस के टाप टेन की सूची में नंबर वन संतोष झा की संपत्ति को जब्त करने की भी पुलिस ने कार्रवार्इ की है। पुलिस की माने तो संतोष झा ने सिर्फ रंगदारी की रकम से करीब 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति अर्जित की है। पुलिस की तफ्तीस में यह बात सामने आयी है कि उक्त अपराधी के काठमांडू, जमशेदपुर, रांची, कोलकता में फ्लैट है तो उड़ीसा में उसके आलीशान होटल की भी चर्चा है। इतना हीं नहीं असम के गुवाहाटी में उसने करोड़ों की लागत से एक बड़ा स्कूल तक खोल रखा है, जिसको उसके खास सहयोगी मुकेश पाठक का पिता डील करता है। संतोष बडे़ ठाठ से अपने गूर्गों के माध्यम से कंस्ट्रक्शन कंपनी से रंगदारी की वसुली करता था। काठमांडू में भी उसने अपने व्यवसाय को रंगदारी के माध्यम से चमकाना शुरू किया था। बाद में सहयोगी चिरंजीवी की गिरफ्तारी के बाद से गिरोह को सबसे बड़ा झटका लगा। चिरंजीवी, गिरोह के शार्प शूटर विकास झा उर्फ कालिया के साथ छोटकी भिटठा से पकड़ा गया था। चिरंजीवी के पकड़े जाने के बाद हीं संतोष ने अपना ठिकाना बदल लिया और तभी से वह कोलकाता में अपने संबंधी के यहां छिप कर रहने लगा। बाद में रंगदारी की रकम से हीं उसने वहां दो फ्लैट भी खरीद लिया। संतोष के बारे में पुलिस ने बताया है कि कम उम्र के लड़कों को गिरोह में शामिल कर उसने रंगदारी के लिए हत्या कर दहशत फैला दिया था। हालांकि यह भी सच है कि संतोष झा के नाम पर कुछ छुटभैये अपराधियों ने भी रंगदारी मांगने का प्रचलन बना लिया था। तत्कालीन एसपी श्री सिन्हा कहते हैं कि संतोष झा के नाम का दुरूपयोग भी हुआ है। उसके नाम का इस्तेमाल कर भी अपराध किये गये हैं।